एक उपहार ऐसा भी- 5

(Ek Uphar Aisa Bhi- Part 5)

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नमस्कार दोस्तो, कामुक कहानी के पहले ये सारी भूमिकाएं जरूरी हैं. और आप यकीन मानिये हर बार मैं कहानी को संक्षिप्त करने का प्रयत्न करता हूँ. पर लंबी ही हो जाती है.

मैं सभी पाठक पाठिकाओं को निरंतर सहयोग के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ. साथ ही यह भरोसा दिलाना चाहता हूँ कि कहानी के साथ बने रहें. रोमांच और कामुकता के शिखर तक पहुंचाने का वादा है मेरा।

अब कहानी बड़े रोमांचक दौर में पहुंच रही है.

मैं खुशी और वैभव के बुलावे पर इंदौर पहुंच गया. और मैं इंदौर पहुंचकर वहां की फिजाओं में हरपल खुशी को महसूस करने लगा.

लेकिन वहाँ स्टेशन पर मुझे लगा कि लोग मुझे ज्यादा ही घूर कर देख रहें हैं. शायद मैं भी लोगों को आकर्षित कर रहा था, जिसका अहसास मुझे खुद को नहीं था।

वैसे तो मुझे अपनी प्रशंसा बिल्कुल पसंद नहीं है पर आपने भी लंबे समय से मेरे बारे में कुछ जाना सुना नहीं है, तो अपने बारे में जानकारी देना आवश्यक हो जाता है।

मेरी उम्र पैंतीस वर्ष है, गोरा हूँ पर सफेद नहीं, इंडियन गोरे और विदेशी गोरों में जो भेद होता है उसी से आप मुझे भी समझ सकते हो. मेरी हाइट 5’7″ इंच और शरीर कसरती है. हालांकि अब पेट में पैक बनने की जगह थोड़ी सी चर्बी समाहित हो गई है. पर मैं तोंदूमल कहीं से नहीं बना हूं।

अपनी उम्र से कम ही लगता हूँ और किसी भी प्रकार के कपड़े मुझ पर फबते हैं, वैसे तो चश्मा पहनकर मेरे फोटोग्राफस बहुत अच्छे आते हैं, पर लड़कियाँ सबसे ज्यादा मेरी भूरी आँखों पर ही मरती हैं.

सादगी भरा जीवन और सादगी पूर्ण पहनावा मेरी पहचान है. कलात्मक चीजों में मेरी सर्वाधिक रूचि रहती है।

उस दिन भी मैं जब ट्रेन से उतरा तो सादगीपूर्ण लाइट पिंक कलर की प्लेन शर्ट और डार्क ब्लू कलर की एंकर फिट पैंट पहन रखी थी. हल्की ठंड की वजह से मैंने यलो कलर का हाफ स्वेटर डाल रखा था, व्हाइट सॉक्स और ब्राऊन शूज में मॉडलों जैसी संयमित चाल, मेरे व्यक्तित्व को निखार रही थी।

मैंने गहरे रंग का चश्मा सफर के धूल-धूप से बचने के लिए पहन रखा था. मैं क्लीन शेव ही था. पर अब हल्की सी खूंट नजर आने लगी थी.

और मेरे होंठों पर स्माइल तो रहती ही है. फिर खुशी से मिलने की खुशी में चेहरे पर निखार आना तो स्वाभाविक ही है. मैं अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व और हैंडसम होने के बावजूद थोड़ा नर्वस था. क्योंकि मैं जहाँ जा रहा था, वो बहुत ही ज्यादा अमीर घराना था और उनके कायदे कुछ अलग ही होते हैं।

तभी मन में एक बात आई कि यार मैं तो मेहमान हूँ. और जरूरी नहीं कि मेहमान भी मेजबान की हैसियत का हो.
फिर क्या था … हम तो अपनी मर्जी के राजा हैं. और ये सब सोचते हुए पता ही नहीं चला कि कब हम होटल पहुंच गये।

होटल का बाहरी गेट ही बहुत भव्य तरीके से सजा था. और गाड़ी जैसे-जैसे आगे बढ़ी तो होटल के हर कोने की सजावट देखते ही बनती थी.

फिर गाड़ी होटल के अंदर वाले मेन गेट पर रुकी. दरबान ने लपक कर गाड़ी का दरवाजा खोला.

सामने ही हाथ जोड़े एक सुंदर युवती खड़ी थी। वो देखने से ही किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी.

उसने कहा- आइये संदीप जी, दीदी की शादी में आपका स्वागत है.

मैं उसे कुछ पल यूँ ही देखता रहा. उसने भी नजरें मिलाई और मुस्कान बिखेरी.

तभी हमारे पीछे वाली गाड़ियाँ भी आकर रूकने लगी. और मुझे होटल स्टाफ की एक सुंदरी अपने साथ अंदर ले गई।

होटल का स्टाफ ड्रेस में था. इसलिए मैं उन्हें पहचान पा रहा था. नहीं तो उनकी खूबसूरती तो कयामत की थी। होटल में सिक्योरिटी बहुत टाइट लग रही थी. अगर मैं मेहमान बनाकर ना बुलाया गया होता तो मेरा इस होटल में घुसना भी मुश्किल होता।

खैर होटल में सबसे पहले छोटा हॉल था जहाँ मुख्य रिशेप्सन के अलावा बैठने की व्यवस्था और चाय पानी की पूरी व्यवस्था थी.
सब कुछ हाई क्लास का था.

उसके दाईं ओर बड़ा और खूबसूरत लकड़ी का गेट था. मुझे होटल वाली सुंदरी अपने पीछे वहीं ले गई।

आगे बढ़ने पर पता चला कि वो बड़ा हॉल था जहाँ कार्यक्रम होते होंगे. उस हॉल के चारों ओर गैलरी भी बनी हुई थी.
दो दिशा पर सीढ़ियाँ थी और साथ में लगी लिफ्ट थी।

चारों तरफ आकर्षक लाइटें और पेंटिंग की सजावट के साथ कहीं कहीं पर बेहतरीन सोफे सजे हुए थे. वहीं बैठी एक बहुत ही खूबसूरत महिला उठकर पास आने लगी. उसने स्लीवलेस डीप नेक ब्लाऊज के साथ डार्क स्लेटी रंग की मंहगी चमकिली साड़ी पहन रखी थी.

उसने दूर से ही मुस्कुराहट बिखेरी और हाथ जोड़कर मेरा अभिवादन करते हुए कहा- आइये संदीप जी, आपका ही इंतजार हो रहा था।
मैंने भी हाथ जोड़कर अभिवादन स्वीकारा.

मैं ये तो जान चुका था कि ये मुझे पहचान क्यों रहे हैं. पर ‘आपका ही इंतजार’ मुझे इस शब्द में रहस्य नजर आया।

लेकिन मेरी दुविधा उस अपसरा जैसी महिला ने स्वंय दूर कर दी.
उसने कहा- मैं खुशी की भाभी हूँ. खुशी आपके बारे में बहुत बातें करती है. उनकी बातें सुनकर मैं भी आपसे मिलना चाहती थी.

अब मेरे मुंह से निकल गया- वो सब तो ठीक है! पर खुशी है कहां?
भाभी जी थोड़ा और हंसी और आँखें मटकाते हुए कहा- संदीप जी, उसकी शादी है. और शादी के समय की व्यस्तता तो आप समझ ही सकते हैं. फिलहाल आप फ्रेश हो जाईये, मैं अवसर देखकर आपको उससे मिलवाती हूँ।

फिर भाभी ने होटल की एक और सुंदरी को इशारा करके बुलाया और कहा- साहब को 36 नं. कमरा दिखा दो.
और फिर मुझसे कहा- आप कमरा देख लीजिए और फ्रेश होकर ब्रेकफास्ट कर लीजिए. फिर मैं आती हूँ. कुछ पूछना हो तो ये आपकी पूरी मदद करेंगी।

मैंने मुस्कुरा कर जी शुक्रिया कहते हुए विदा लिया.

उसने वहाँ किसी और को रूम नं. बताया और एक ओर लिफ्ट की तरफ चल पड़ी. अब मेरे सामने-सामने होटल वाली सुंदरी चल रही थी. उसके हिलते नितंब मेरी वासना को भड़का रहे थे.
वो बला की खूबसूरत थी. उसने बहुत सा मेकअप कर रखा था. उसकी उम्र लगभग 27-28 वर्ष रही होगी।

लिफ्ट में मैंने उससे नाम भी पूछ लिया. उसका नाम नेहा था. उसने चौथी मंजिल में लिफ्ट रोकी और वहाँ सबसे कोने वाले 36 नं. कमरे में ले जाकर एक कार्ड जैसी पुस्तिका देते हुए बहुत सी बातें बताई।

सबसे पहले कहा- इसमें सभी सुविधाओं के लिए अलग-अलग नं. दिये हुए हैं. आप इन पर कॉल करके सुविधा ले सकते हैं।
उसने कहा- यहाँ से कहीं भी आना-जाना हो तो आप होटल की गाड़ी का इस्तेमाल कर सकते हैं. खाने-पीने के संबंध में भी आप चौबीस घंटे सर्विस ले सकते हैं. सफाई संबंधित परेशानी के लिए भी आप बोल सकते हैं.
एक टेबल पर रखे फोन को दिखा कर कहा, ये फोन आप उपयोग कर सकते हैं।

फिर उसने मुझे एक और कार्ड दिया और उस पर लिखे एक नं. को दिखाकर कहा- और कोई बात हो तो आप मुझे कह सकते हैं. वैसे आपका नाम हमारे खास मेहमानों की लिस्ट में है. आप घर की गाड़ी या नौकरों की सेवा भी ले सकते हैं.

हमारी बातचीत के दौरान ही मेरा सामान भी ऊपर आ गया।

फिर नेहा ने मुझे एक अलमारी खोल कर दिखाई और कहा- सर, यहाँ नाइट गाऊन और टावेल वगैरह रखे हैं.
और फिर आगे चलकर फ्रीज भी दिखाई और साथ ही कहा- सर यहाँ ड्रिंक या स्मोकिंग करनी हो तो मुझे कॉल कीजिएगा. घरेलू कार्यक्रम की वजह से यहाँ से वो चीजें हटा दी गई हैं।

अब मैंने बात पकड़ ली- हटा दी गई हैं मतलब? अगर घरेलू कार्यक्रम ना होता तो क्या होता?
उसने मुस्कुराते हुए कहा- सर अगर घरेलू कार्यक्रम ना होता तो क्या होता आप भी जानते हो, हमारे यहाँ सभी सुविधाएं दी जाती हैं।
मैंने फिर कहा- सभी सुविधाएं?
उसने फिर मुस्कुरा के कहा- हाँ सर, सभी सुविधाएं।

मैंने फिर कहा- सभी उम्र की सुविधाएं?
इस बार उसने शर्माते हुए मुस्कुरा के कहा- सर हमारे कुछ लोगों से संपर्क है, इस संबंध में हम उन्हीं से सीधे बात करवा देते हैं. फिर जो भी तय होता है उसमें होटल मेनेजमेंट को कोई तकलीफ नहीं होती।

मैंने लंबी आहह भरते हुए कहा- ओहह … मैं तो हवा में ही उड़ने लगा था. खैर मैं ड्रिंक और स्मोक नहीं करता. फिर भी जरूरत पड़ी तो तुम्हें याद करूंगा. और तुम्हारे बात करने का अंदाज बहुत प्यारा है और उससे भी ज्यादा तुम खुद प्यारी हो। अब तुम जा सकती हो।

उसने चहक कर थैंक्यू सर कहा और जाने लगी.
पर दरवाजे से पहले ही रूक गई और वापस आकर कहा- सर एक और बात है!
मैंने कहा- हाँ हाँ कहो?

नेहा ने कहा- सर कुछ लोगों को समय-समय पर बिन मांगे सुविधा लेना अच्छा लगता है. लेकिन उससे प्राइवेसी में बाधा भी आती है. और कुछ लोग जरूरत पड़ने पर खुद याद कर लेते हैं. इससे प्राइवेसी बनी रहती है. आप कैसे रहना पसंद करेंगे सर?

अब मैंने लाइन मारते हुए कहा- अगर हर बार तुम ही आओगी, तो प्राइवेसी जाए भाड़ में! लेकिन बैरा, वेटर या कोई और बार-बार परेशान करेगा तो अच्छा नहीं लगेगा।
उसने हँसते हुए कहा- आप बहुत फनी हैं सर! सॉरी सर, यहाँ सबका काम बँटा हुआ है. हर बार मेरा आना संभव नहीं होगा. मेरे ख्याल से आपके लिए दूसरा विकल्प ठीक रहेगा।

मैंने हंसकर कहा- अच्छा तो अभी से तुम अपना फैसला थोपने लगी?
मेरी इस बात से वो हड़बड़ा गई, उसने कहा- सॉरी सर, मेरा ये मतलब नहीं था. आप जो कहोगे, वही होगा।
मैंने उसे फिर छेड़ा- जो कहूंगा वो होगा?
अब वो बेचारी क्या कहती उसने चुप रहकर सर झुका दिया.

मैंने फिर हंसते हुए कहा- अरे नेहा जी डरो नहीं! हम तो यूँ ही मजाक कर रहे थे. चलो अब तुम जाओ. बस इतना ख्याल रखना कि 36 नं. का काम जो भी देखे वो थोड़े ढंग का हो।

जानबूझ कर मैंने सिर्फ 36 नं. कहा, उसमें कमरा या रूम शब्द नहीं जोड़ा. क्योंकि मेरे अनुमान से नेहा के बॉडी फिगर का साइज 36- 24 – 36 का लग रहा था।
मेरी बातों से उसके चेहरे की मुस्कान उसके कानों तक खींच आई, उसने कहा- आप फिक्र ना करें सर! आपकी खुशी का ख्याल रखना हमारी जिम्मेदारी है।

खुशी का नाम सुनते ही मुझे एक बात सूझी. मैंने झट से कहा- अच्छा सुनो मेरा एक काम करोगी?
उसने कहा- हाँ कहिये ना सर?
उसके शब्दों में दृढ़ता तो थी पर चेहरे पर कौतुहल नजर आ रहा था।

मैंने कहा- यार तुम्हें तो पता है कि दुल्हन का नाम भी खुशी है. क्या तुम बीच-बीच में उसकी खबर मुझ तक पहुंचाती रहोगी?
उसने कहा- ठीक है सर. उनका कमरा तीसरी मंजिल पर 63 नं.का है. पास वाले 64 नं. कमरे में उनकी चाचा फैमली, और 62 नं. कमरे में नीचे जो भाभी जी मिली थी, वो ठहरी हैं. आगे और कोई जानकारी होगी तो बताऊंगी।

फिर मैंने उसे जाने दिया.

हमारी बातचीत में पता ही नहीं चला कि कब आधा घंटा गुजर गया.

खुशी की शादी में मेरी यानि संदीप की लोफरगिरी की कहानी जारी रहेगी.
कहानी कैसी चल रही है, आप अपनी राय इस पते पर दे सकते हैं. मुझे आपके मेल का बेसब्री से इंतजार रहता है।
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