लण्ड न माने रीत -8

(Lund Na Mane Reet-8)

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अब तक आपने पढ़ा..
मैंने इत्मीनान से एक सिगरेट सुलगा ली और हल्के-हल्के कश लगाने लगा.. एक तो शराब का सुरूर ऊपर से यह अहसास कि आरती मेरे साथ घर में अकेली है और कुछ ही देर बाद उसका नंगा बदन मेरी बाँहों में होगा और रात अपनी होगी ही।
ख़ास अहसास यह.. कि लड़की को उसी के घर में.. उसी के बिस्तर में.. चोदना.. एक अलग ही रोमांच देता है.. यह सब सोचकर मेरे लण्ड में तनाव आने लगा। मुझे लगा कि यह रात मेरी ज़िन्दगी की सबसे हसीन रात होने वाली है। मैंने पैन्ट के ऊपर से ही छोटू को सहला कर सांत्वना दी कि सब्र कर बच्चू.. अभी थोड़ी देर बाद ही तू आरती की रसीली चूत में गोता लगाएगा.. थोड़ा सा सब्र कर ले..
अब आगे..

‘अभी तक आप यहीं बैठे हो.. ऊपर चलो.. मैं अभी आई दरवाजा बंद करके..’
अचानक आरती की आवाज़ ने मुझे चौंका दिया।
मैं जल्दी से उठा और सीढ़ियाँ फांदते हुए ऊपर आरती के कमरे में जाकर पलंग पर पसर गया।

कुछ ही देर बाद आरती भी कमरे में आ गई और पलंग के पास आकर खड़ी हो गई।
मैं भी अपने पैर नीचे लटका कर बैठ गया और उसकी कमर में हाथ डाल उसके नितम्बों को सहलाता हुआ उसे अपनी गोद में बैठा लिया।
वो मेरी तरफ मुँह करके बैठी थी.. उसकी मांसल जांघें मेरी जाँघों पर चढ़ी हुई थीं।
मैंने उसके दोनों दूध थाम लिए और उसकी गर्दन को चूमते हुए गालों को काट लिया और फिर उसका निचला होंठ अपने होंठों से दबा के चूसने लगा।

वो कोई विरोध नहीं कर रही थी.. शायद इस एकान्त को वो भी जी भर के भोगना चाहती थी।
जल्दी ही उसने अपनी बाँहों का हार मेरे गले में पहना दिया और अपनी जीभ मेरे मुँह में धकेलने लगी।

मैंने भी उसकी चूत को नाइटी के ऊपर से ही सहलाना शुरू किया और उसकी जीभ अपने मुँह में ले ली। उसने चड्डी नहीं पहनी थी.. इसलिए उसकी चूत की तपिश मेरी हथेली को गरम कर रही थी।

हमारा प्रगाढ़ चुम्बन काफी देर तक चला.. हमारी साँसें फूलने लगीं.. तो रुकना पड़ा।
वो उठकर खड़ी हो गई.. उसकी साँसों के साथ-साथ उसके भारी स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। उसकी आँखों में वासना के गुलाबी डोरे तैरने लगे थे और उसका मुँह अभी भी खुला हुआ था।उसका पूरा बदन जैसे पुकार-पुकार कर कह रहा था कि उठो और दबोच लो मुझे.. और मसल डालो.. रौंद डालो मुझे.. बेरहमी से..

तभी उसने अपना एक पैर पलंग पर रख दिया.. उसकी जांघ मेरे गाल से छूने लगी और उसकी चूत मेरे मुँह के ठीक सामने थी.. लेकिन ढंकी हुई। मैंने उसकी नाइटी उसकी चिकनी जांघ पर से ऊपर सरका दी और चूत को उघाड़ने लगा.. लेकिन उसने नाइटी पकड़ ली और मुस्कुराते हुए इंकार में गर्दन हिला दी और मुझे अंगूठा दिखाती हुई दूर हट गई।

मैंने उसे फिर से पकड़ लिया और बेसब्री से यहाँ-वहाँ चूमने लगा, वो मेरी शर्ट के बटन खोलने लगी, उसने शर्ट उतार कर बनियान भी निकाल दी और मेरे सीने पर हाथ फेरने लगी।
मैंने भी उसकी नाइटी सामने से खोल दी और उसकी नंगी चूचियाँ दबोच लीं और उसके होंठों का रस फिर से पीने लगा।

उसके होंठ चूसते हुए ही मैंने अपनी बेल्ट खोल कर पैंट नीचे खिसका दी और अपना अंडरवियर भी नीचे कर दिया।
मेरा लण्ड स्प्रिंग लगे खिलौने की तरह से उछला और उसके पेट से जा टकराया। तभी आरती ने मुझे धक्का देकर बिस्तर पर गिरा दिया.. इसके साथ ही उसने मेरी पैन्ट और अंडरवियर को खींच कर निकाल दिया और अपनी नाइटी भी फुर्ती से उतार कर फर्श पर फेंक दी।

अब वो मेरे सामने मादरजात नंगी खड़ी थी.. उसकी नज़र मेरे लण्ड पर थी.. फिर वो धीरे-धीरे अदा से चलती हुई आई और मेरे पास बैठ गई।
मैंने उसे पकड़ कर अपने करीब चित्त लिटा लिया और मैं खुद उठ कर बैठ गया।
मैं कुछ देर उसका नंगा बदन जी भर के देखना चाहता था।

मित्रो.. कई वर्षों के बाद उस दिन आरती फिर मेरे सामने पूरी नंगी लेटी थी। कई साल पहले जब मैंने आम के पेड़ पर मचान के ऊपर उसकी चूत की सील का छेदन कर उसका कौमार्य लूटा था.. तब वह एक नाज़ुक सी कमसिन कली थी। उसके अल्प विकसित स्तन छोटे टमाटर की तरह हुआ करते थे और उसकी मासूम गुलाबी चूत की फांकें आपस में सटी हुई थीं.. नाज़ुक से हाथ-पैर थे.. उसकी आँखों से बचपन का भोलापन गया नहीं था..
लेकिन आज मेरे सामने वो नंगी लेटी साक्षात रति की प्रतिमूर्ति लग रही थी। उसके गदराये बदन की कशिश में एक अजीब सी मादकता थी.. जो देखने वाले को पहली ही झलक में दीवाना करके रख दे। उसके सौन्दर्य में कमनीयता नहीं.. वरन एक परिपक्व कामुक स्त्री का सा भाव झलकता था।

उसके पहाड़ जैसे स्तन चैलेंज देने की सी मुद्रा में खड़े थे कि आओ हमें विजित कर सको तो कर लो.. उसका सपाट पेट.. दक्षिण की तरफ नाभि.. भी किसी गहरे कूप की तरह गंभीर लग रही थी..।

उसके और नीचे कदली जाँघों के मध्य उसकी चूत.. उसका तो रूप-रंग.. आकार-प्रकार.. सब बदल चुका था.. वो कमसिन सी मासूम चूत एकदम बदल गई थी, उसकी फांकों पर पहले की गुलाबी रंगत की जगह श्यामलता.. हल्की सी कालिमा आ गई थी।
आरती की चूत के लब अब पहले की तरह आपस में सटे नहीं रह गए थे.. एक-दूसरे से छितरा गए थे.. और उनके बीच लगभग एक अंगुल जितना फासला हो गया था.. जिनके बीच से भीतर की चुकंदर के रंग की ललाई झाँक रही थी।

चूत का चीरा भी काफी लम्बा हो गया था.. जिसके उपरी सिरे पर स्थित एक डेढ़ अंगुल बड़ा दाना चूत के उग्र स्वभाव की घोषणा कर रहा था।
ये सब लक्षण बता रहे थे कि शादी के बाद वो किस कदर चुदी होगी।

मैं मंत्रमुग्ध सा उसका रूप परिवर्तन निहार रहा था कि तभी उसने मुझे टोक दिया।
‘क्या देख रहे हो बड़े पापा?’
‘देख रहा हूँ कि तू कितना खिल गई है.. निखर गई है.. शादी के बाद…’ मैं तारीफ़ भरे स्वर में बोला।

‘मुझे खिलाया तो आपने ही था पहले पहल.. कली से फूल बनाने वाले तो आप ही हो.. मुझे लड़की से औरत बनाने वाला तो वो खड़ा है आपके पेट के नीचे..’
वो मेरी आँखों में झांकती हुई बोली और मेरा लण्ड पकड़ लिया।

मैं मुस्कुराया और झुक कर उसे चूमने लगा और हाथ बढ़ा कर उसकी चूत पर रख दिया। चूत पर बहुत ही छोटी-छोटी झांटें उगी थीं.. नाखून जितनी बड़ी.. मैं उन्हें सहलाने लगा।

वो कुनमुनाई और मेरी गोद में सिर रख कर मेरे खड़े लण्ड से गाल सटा कर लेट गई। मैं अपने लण्ड पर उसके गाल की तपिश महसूस कर रहा था। फिर वो धीरे-धीरे अपना सिर दायें-बायें हिलाने लगी.. जिससे मेरा लण्ड भी साथ उसके गाल से टकराता हुआ डोलने लगा।

मैंने भी आरती का हाथ अपने हाथ में ले लिया। उसके हाथों में मेहंदी रची हुई थी.. मैंने उसका हाथ चूम लिया और उसकी उँगलियाँ चूसने लगा।
उसने मुस्कुरा कर मेरी तरफ देखा और मेरे लण्ड की तरफ करवट ले ली और मेरे लण्ड को गौर से देखने लगी।
‘क्या देख रही हो गुड़िया..?’ मैंने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा।
उसने मुस्कुरा कर मेरी तरफ देखा और ‘कुछ नहीं…’ के अंदाज़ से सिर हिला दिया।

फिर उसने मेरे मुँह से अपनी उँगलियाँ निकाल लीं और वो उँगलियाँ मेरे लण्ड पर लपेट दीं.. ठीक मेरी झांटों के पास से..॥ उसके मेहंदी रचे गोरे नाजुक हाथ में काला कलूटा खड़ा लण्ड.. कितना विकराल और डेंजरस दिखता है.. यह मैंने उस दिन जाना।

फिर उसने दूसरे हाथ की उँगलियाँ भी ऊपर की तरफ लपेट दीं.. फिर पहले वाली उँगलियों को हटा कर लण्ड के अगले सिरे की तरफ लपेट दीं।

अब मेरा सुपाड़ा उसकी उँगलियों से छिप गया था। फिर उसने एक हाथ की मुट्ठी में लण्ड को पकड़ लिया और मोटाई का अंदाजा लगाने लगी।
उसने विस्मय से मेरी तरफ देखा और मुस्कुरा दी।
‘क्या हुआ.. तू कर क्या रही है..?’ मैंने अधीर होकर पूछा।

दोस्तो, मुझे पूरी उम्मीद है कि आपको मेरी इस सत्य घटना से बेहद आनन्द मिला होगा.. फिर जल्द ही मुलाक़ात होगी।
आपके ईमेल मुझे आत्मसम्बल देंगे.. सो लिखना न भूलियेगा।
कहानी जारी है।
[email protected]

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