खेत खलिहान-4

(Khet Khalihan Me Desi Chhori Ka Yauvan Ka Khel- Part 4)

लीलाधर 2018-05-21 Comments

कहानी का पहला भाग: खेत खलिहान-1
कहानी की तीसरा भाग: खेत खलिहान-3

रेणु ने रोका,”ऐ, क्या करते हो।”
सुरेश उसके स्तनों पर झुक गया। उनकी दोनों कलियों को चूमने और चूसने लगा। एक को चूसता तो दूसरे को हाथ से सहलाता। फूलकर वे कड़ी हो गईं। रेणु सीत्कार भर रही थी, उसका सिर सहला रही थी। उसे अच्छा लग रहा था संजना की तुलना में खुद तरजीह पाना।
संजना हाथ कसमसाना छोड़ इधर ही देख रही थी। उसके अपने चूचुक भी खड़े हो गए थे। सुरेश उन्हें गौर से देख रहा था – सधे और सुडौल, पसलियों पर से सुंदर गोल उठान लिए उठते हुए – उनपर भूरी-गुलाबी नोंकें मानों गुस्से में नाक फुलाए हों। रेणु के स्तन बड़े थे मगर उनमें संजना की सी गोलाई नहीं थी । संजना के गोल स्तनों और सुंदर नुकीले चूचुकों को देखकर उसका लिंग जोर-जोर से धड़क रहा था।
सुरेश ने रेणु की चड्ढी में हाथ घुसाया और भगोष्ठों को टटोला। घने बालों के बीच भींगी हुई गहराई। पसीना है या अंदर का द्रव? उसने उंगली घुसाकर अंदर की थाह ली। रेणु कमर हिलाने लगी।
सुरेश ने नजर उठाई तो संजना से मिल गई। वह मुस्कुरा पड़ा। मन हुआ उसको कहे कि ‘मैं असल में तुमको प्यार करता हूँ। तुमको अपने सामर्थ्य में और अच्छे से करने की कोशिश करूंगा।’ लेकिन इस अवस्था में ये कैसे यकीन करेगी। बेचारी… उसे दुःख हुआ।
उसने रेणु की चड्ढी उतार दी। बालों की कालिमा प्रकट होकर चिढ़ाने लगी। रेणु ने भी सुरेश की चड्ढी खींचकर लिंग को बाहर निकाल लिया और उसे हाथों में पकड़कर सहलाने लगी।
संजना पहली बार किसी बालिग लिंग को उत्थित रूप में देख रही थी — साँवला सा मोटा डंडा, चमड़ी की चुन्नटों के अंदर से झाँकता थूथन!
रेणु ने खींचकर चमड़ी गर्दन के पीछे कर दी। दर्द से सुरेश कराह गया।
देखकर संजना ने डर से सिर घुमा लिया। क्रोध से लाल माथा – सांप की तरह फन ताने। बाप रे, यही अंदर जाता है! कितना बड़ा है!
रेणु ने उठकर लिंग के माथे को चूमा और उसे मुँह में ले लिया। कनखी से देखती संजना की आँखें फट गईं। ऐसा करते हैं भला!!छी!
काफी देर से उत्तेजित तरुण के लिए लिंग पर इस चुम्बन को सहना मुश्किल था। उसने रेणु को लिटाया और उसकी जाँघों के बीच आ गया। लिंग को पकड़कर होठों पर टिकाया। रेणु ने पकड़कर उसे रास्ता दिखाया और उम्मीद में आँखें बंद कर लीं।
सुरेश ने धक्का देने से पहले सिर घुमाकर संजना को बोला,”आई लव यू।” और लिंग रस से गीले होंठों के पार कर दिया। आनंद में डूबी रेणु को लगा सुरेश ने उसी को ‘आय लव यू’ कहा है। वह उत्साह से उचक गई। लिंग और एक इंच अंदर धँस गया। आ..ऽ..ऽ..ऽ.. ह….
न चाहते हुए भी संजना को अपनी जाँघों के बीच फुकफुकी सी होती महसूस हुई। उसके वक्षों पर चमकते जामुन और सख्त हो गए। । सुरेश ने उन्हें देखते एक और धक्का मारा। इन जामुनों को अच्छे से मुँह में घुलाकर पकाऊंगा। रेणु की योनि से उसके लिंग की दोस्ती थोड़ी और गहरी हो गई।
संजना परेशान हो रही थी – रेणु को करते हुए भी सुरेश की नजर उसके वक्षों पर ही जमी थी। उसने हाथ कसमसाए। अपने भगों में हो रही सुरसुराहट को शांत करने के लिए भी हाथों की जरूरत थी।
नजर मिलते ही सुरेश ने संजना की ओर हवा में एक चुम्बन उछाला और लिंग को रेणु में और चाँप दिया। लिंग अंदर जड़ तक पहुँच गया रेणु की एक दर्दीली ‘ओह’‘ओह’ सी निकली। कुछ क्षण और दबा-दबाकर उसकी गहराई का आनंद लेने के बाद सुरेश ने लिंग अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया।
आँखों के सामने चल रहा यह उत्तेजक खेल संजना को गर्म करने के साथ साथ क्षुब्ध भी कर रहा था – कभी सोचा न था इस तरह कोई उसे पल-पल अपमानित करता हुआ सेक्स करेगा।
रेणु की सिसकारियाँ निकल रही थीं। सुरेश के साथ उसने पहले भी सेक्स किया था, लेकिन आज संजना की मौजूदगी में करने में गजब का रोमांच हो रहा था। समूचा शरीर सितार के तार की तरह टन-टन बज रहा था। रेणु दूने जोर से कमर उचका रही थी। वह उसके धक्कों पर ‘हाँ हाँ हाँ हाँ’ कर रही थी। उसकी योनि छलछला रही थी और लिंग को जोर-जोर भींचकर पकड़ रही थी। सुरेश को लग रहा था आज इसका रास्ता इतना टाइट कैसे हो गया? उसकी लिंग की गरदन में कसी चमड़ी दर्द कर रही थी और योनि की रगड़ उस दर्द को बढ़ा रही थी।
एक दूसरे को लपेटते-रगड़ते-पटकते चरम सुख का समय आ गया। रेणु तो उससे लिपटी लिपटी स्खलित हो गई मगर सुरेश ने होश कायम रखे और उसकी जकड़ से निकलकर बाहर वीर्यपात किया। रेणु स्खलन के दौरान उसके लिंग को सहलाती रही।
संजना हैरानी से सब देख रही थी। सुरेश का खुद पर नियंत्रण उसे ठीक लगा। रेणु बेवकूफ अंदर ही करवा रही थी। कुछ हो जाता तो! वह दोनों के निढाल चेहरों को देख रही थी। कितने संतुष्ट हैं दोनों। उसे हैरानी हुई क्या वह भी कुछ देर बाद इसी हाल में निढाल पड़ी होगी!
पीछे बंधे उसके हाथ दुख रहे थे। छुड़ाने की कोशिश करती पसीने से भींग गई थी। बोली, “अब हो गया न! खोलो।”
सुरेश उठा, उसका एक गाल चूमा और बंधन खोल दिए। संजना अपनी कलाइयाँ सहलाने लगी। तुरंत उसने अपने वक्षों को हथेलियों से ढँक लिया। जाँघें सटाकर स्कर्ट में पैरों को छिपाने लगी। इस लज्जा ने सुरेश की लालसा और बढ़ा दी। उसने कमर में गमछा लपेटा और दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया।
बाहर दूर दूर तक कहीं कोई नहीं था। सब तरफ वीरानी थी। गरमी बदन झुलसानेवाली थी। सुरेश जल्दी से अंदर आ गया। निकलते हुए उसे आशंका हुई थी संजना कोई गड़बड़ तो नहीं करेगी लेकिन अंदर आकर देखा तो एक चादर में संजना और रेणु दोनों घुसी हुई थीं और संजना उससे कुछ बोल रही थी।
दोनों को आए काफी देर हो गई थी। सुरेश ने अपना टिफिन निकाला और दोनों को खाना दिया। संजना ‘मुझे भूख नहीं है’ करने लगी मगर सुरेश ने पानी लाकर जबरदस्ती उसके हाथ धुला दिए -“खा लो, भूखे पेट लू लग जाएगी।” रेणु तो संभोग के बाद और बेधड़क हो गई – “अरे, खा लो ना। अगली मेहनत तुम्हीं को करनी है।”
सुरेश ने कौर तोड़कर उसके मुँह से लगा दिया। संजना को मजबूरन मुँह खोलकर कौर अंदर लेना पड़ा। बार-बार ऐसा होने पर संजना खुद से खाने लगी।

सुरेश उसे खाते देखता हुआ रीझ रहा था–कोमल पतली उंगलियों से रोटी तोड़ना, कौर उठाना, मुँह में लेकर चबाने में गालों और गले की पेशियों की सुंदर हरकत। नंगे कंधों और बाँहों के नीचे चादर में छुपा बदन । दुल्हन के जोड़े में सजी पलंग पर बैठी कैसी लगेगी? स्कर्ट में उसके भरे घुटने और थोड़ी सी जाँघें देखकर वह उनके बीच छिपे भग-प्रदेश की कल्पना कर रहा था। सोचकर हँसा कि आज इसको पेट से ही कर दूँ तो कैसा रहे। तब शादी के लिए मान जाएगी। फिर फुरसत से जिंदगी भर लेता रहूँगा।
“अब? चालू करें?” खाना समाप्त करने के बाद उसने पूछा।
संजना जैसे इसी हथौड़े के गिरने का इंतजार कर रही थी। उसने एकदम से चादर गले तक खींचकर अपने में लपेट लिया।
रेणु बोली, “इसको मेरे सामने शरम आ रही है। मैं चली जाती हूँ।” वह उठने लगी। संजना ने उसका हाथ पकड़ लिया।
रेणु – “बहुत देर हो गई है। घरवाले खोज रहे होंगे।”
संजना – “और मुझे देर नहीं हुई?”
रेणु – “ऐसे ना ना करती रहेगी तो और देर होगी।”
सुरेश – “देख, तू मुझे बहुत अच्छी लगती है। प्यार से दे दे, मैं तेरे साथ जबरदस्ती नहीं करना चाहता।”
रेणु उठी और अपने कपड़े उठा लाई। संजना का कलेजा मुँह को आ गया। ये चली गई तो सुरेश उसके साथ जो मन चाहे सो कर लेगा। वह भी उठने लगी। सुरेश ने हाथ पकड़कर बैठा लिया, “तू कैसे जाएगी? तेरी खातिर ही तो वो जा रही है।”
रेणु और सुरेश दोनों संजना से खेल रहे थे।
सुरेश -“अगर तू अपनी वो, मतलब कि (उसने उसकी जांघों के बीच इशारा किया) इसको बचाना चाहती है तो उसमें कुछ नहीं करूंगा। इतना मैं तेरे लिए कर सकता हूँ। तू मुझे पसंद है।”
“प्लीज, मुझे छोड़ दो, प्लीज…”
“अच्छा एक बात बता, मेरे साथ रहना चाहेगी? जिंदगी भर? तेरी हर तरह से खातिर तवज्जो करूंगा।”
संजना चौंकी। ये मजाक कर रहा है या सच बोल रहा है? उसको भी यह लड़का पसंद था। अच्छी हैसियत का था। मगर इस तरह जबरदस्ती? नहीं नहीं!
“तेरी कदमों के नीचे फूल बिछा दूंगा।”
रेणु हँस पड़ी , “क्या फिल्मी डायलॉग है।”
संजना के चेहरे पर भी खिंचाव कम हुआ।
“अगर तू मेरी दुल्हन बने तो फिर … तेरी ‘वो’ को सेज पर ही लूँगा।” सुरेश ने जोर से ठहाका लगाया।
संजना बिफर पड़ी। बोली –”जानवर कहीं का।”
सुरेश ने ठहाका लगाया, “तो आदमी बना ले न अपना।”
बेकार की मान-मनौवल में समय जा रहा था। रेणु चुदाई देखने के लिए अधीर थी। बोली, “मैं चलती हूँ। देर हो रही है।”
सुरेश ने संजना से कहा,”चल शुरू कर। तुझे भी देर हो रही होगी।”
संजना के सामने कोई रास्ता नहीं थी। पीछे हाथ बंधवाकर उतनी देर चुदाई देखने के बाद उसमें सुरेश से लड़ने की हिम्मत नहीं बची थी।
सुरेश ने दिल कड़ा किया और अपने होंठ संजना की ओर बढ़ा दिए, “मुझे चूमो।”
संजना स्थिर रही।
“तुझे जबरदस्ती ही पसंद है क्या?”
“प्लीज…!” संजना की हकलाती सी आवाज।
सुरेश ने उसकी कनपटियों पर हाथ रखा और अपनी ओर खींच लिया। इस लड़की को कब से चाह रहा था। आज किस्मत ने खुद ही लाकर उसकी गोद में टपका दिया।
होंठों के नीचे संजना की दबी सी मिमियाहटों से उसको दया आ रही थी। चेहरा अलग कर उसने उसके आँसू पोंछे। कैसी प्यारी लड़की!
नीचे दोनों चूचुक मानों गुस्से में बंदूक की तरह तने थे। उनपर हाथ लगाया। संजना बिदकने लगी। सुरेश ने जबरन सहलाना जारी रखा। न चाहते हुए भी संजना पर ये सहलाहटें और चुम्बन असर करने लगे। उसकी साँस फूलने लगी।
सुरेश को उसकी उत्तेजना देखकर मजा आ रहा था। वह उसके वक्षों पर झुका और चूचुकों को यूँ खींचकर चूसने लगा मानों गूदे में से बीज निकालने की कोशिश कर रहा हो। इस हमले से संजना हड़बड़ा गई –”ओह, ओह, ओह….।” उसके सिर को खींचकर अलग करने लगी। नतीजे में सुरेश के मुँह में उसके चूचुक और खिंच गए। परेशान होकर संजना ने सुरेश को ऊपर खींच लिया और खुद ही उसके मुँह से मुँह जोड़ दिया।
सुरेश ने उसे बाँहों में कसकर भींच लिया।
संजना को अपनी कमर में ढीलापन महसूस हुआ। अरे ये स्कर्ट किसने खोला? रेणु? उसने स्कर्ट पकड़ने की कोशिश की। उसका हाथ सुरेश के खड़े लिंग से टकरा गया।
सुरेश की जीभ उसके मुँह में फड़फड़ा रही थी। कौन मेरी कमर में हुक खींच रहा है?
“उम्म्म्म…… आ…ह!” सुरेश की जीभ उसके तालू, मसूड़ों को पोंछ रही थी।
स्कर्ट उसके नितंबों पर से उतरी। संजना मचलने लगी। सुरेश ने उसको कमर से पकड़कर हल्का सा उठा दिया। एक सख्त मोटी नोक संजना के जांघों के बीच गड़ने लगी। इसके पहले संजना कुछ समझे, स्कर्ट उसके नितंबों से खिसककर घुटनों पर आई और पाँवों से बाहर निकल गई। संजना ने आँखों के कोने से पीछे देखने की मगर वह सामने चुम्बन में उलझी थी। संजना को नितंबों और पीछे जांघों पर ठंडी हवा महसूस होने लगी। चडढी में बंद योनि पर खतरे की घंटी उसके दिमाग में जोर से बजने लगी। सुरेश का लिंग आसपास ही मंडरा रहा था।
सुरेश ने उसे अपनी एक बाँह पर लेते हुए अपने एक तरफ झुकाया और उसके पाँवों पर अपना पाँव डाल दिया।
सुरेश की एक बाँह पर अधलेटी संजना अपनी पूर्णतया नंगी अवस्था से बेहद संकुचित हो रही थी – खासकर अपने काले चूचुकों और पेड़ू पर के बालों के लेकर। उसने अपने पाँव कसकर सटा लिये। उसके चूचुक फुरफुरा रहे थे और बालों के अंदर योनि होंठों के बीच तेज धुकधुकी हो रही थी। वह आँखें मूंदे मन ही मन सुरेश के हमले झेलने को तैयार हो रही थी। वैसे भी, इतनी देर से संभोग के दृश्य देखकर और सोचकर वह ज्यादा विरोध करने की स्थिति में रह नहीं गई थी।
सुरेश ने उसके तने हुए काले अंगूरों को गौर से देखा और चुटकी में लेकर दबाया। रबर सरीखे लचीले और मुलायम। अपनी बाँह पर पकड़कर उसने संजना को अगल-बगल मुड़ने से रोके रखा। चूचुकों को चूसते हुए एक हाथ से भगों के बालों को सहलाया। रेणु ने बचने के लिए घुटने मोड़ लिए। इसपर सुरेश ने बगल से हाथ ले जाकर पीछे से उसके चूतड़ों और उनके बीच गुदा के आसपास सहलाया। संजना ने लाचार होकर पैर फिर से सीधे करके सटा लिए। सुरेश पुनः सामने से भगों को सहलाने लगा।
रेणु इस खेल को देखती आनंदित हो रही थी। उसने संजना की एंड़ियों को पकड़कर अलग कर दिया। सुरेश को संजना के भग-होंठों में उंगलियाँ डालने में सुविधा हो गई। अंदर रसीली चिकनाहट का साम्राज्य फैला था।
छिः छिः छिः यह सब क्या हो रहा है! संजना के तन-मन में अजीब हिलोर-सी उठ रही थी।
सुरेश ने योनि के अंदर उंगली डाली तो उसकी कसावट ने उसके कौमार्य का होश और जोर से करा दिया। उसका लिंग हाहाकार कर उठा। अब और देर नहीं। सुरेश ने उंगली के द्रव को अपने लिंग पर पोछा और संजना के ऊपर आने का उपक्रम करने लगा।
एक बार फिर संजना की ‘नहीं नहीं’ की यंत्रवत पुकार आई और चली गई। उसके बगलों के पास सुरेश की हथेलियाँ जम गई। उसके घुटनों के बीच सुरेश के घुटने धँस गए और भगों के कोमल गद्दे को सुरेश के लिंग की मोटी नोंक कोंचने लगी। डर और उत्सुकता से संजना जड़ हो गई।
रेणु जैसे अपने सपने का दृश्य देख रही थी — संजना आँखे मूंदे, सुरेश के नीचे दबी। उसके अंदर लिंग धँसाने की प्रक्रिया चल रही थी। जल्दी ही वह उसकी टूटी योनि देखेगी। रोमांच से भरकर वह उसके पास खिसक आई।
संजना ने आँखें खोलीं तो रेणु को सीधी अपनी आँख में देखते पाया। संजना ने झ़ट आँखें मूंद लीं। ।
संजना की जाँघें और फैलीं। सुरेश का लिंग उसके योनि होंठों को अलगाता ऊपर से नीचे घूमने लगा।
“देखो कितना गीला है। हैरत है कि इसका पहली बार है?”
कितना अपमानजनक था यह सब सुनना। संजना ने जांघें बंद करने के लिए जोर लगाया। बीच में सुरेश के पाँव अड़े थे। रेणु के तन-मन में सितार झंकृत हो रहा था।।
“देखो !”
“हूँ…!” रेणु उसकी योनि में उंगली डालकर गीलेपन का जायजा ले रही थी।
“छोड़ो मुझे…” रेणु ने आवेग में भरकर जोर लगा दिया। वह छूटने छूटने को हो गई, लेकिन रेणु और सुरेश ने पकड़कर उसे काबू में ले लिया। सुरेश तो उसके ऊपर लेट ही गया। लिंग से ही उसका छेद टटोलने लगा। कुँआरी सँकरी छेद इतनी आसानी से मिलनेवाली नहीं थी। सुरेश कोशिश करता रहा। रेणु की तो पूछो मत। उसे तो लग रहा था जैसे स्वयं उसी का कौमार्य भंग हो रहा है। उसके बदन में सितार की ‘झिर झिर’ सी दौड़ रही थी। ।
रेणु – “मदद करूँ क्या?” वह अधीर थी।
सुरेश को एक जगह दलदली सी कमजोर जमीन महूसस हुई। उसने उसी में जोर लगा दिया। कोशिश का इनाम मिला। लिंग धँस गया। संजना चीखी।
“मिल गया…” सुरेश की हाँफती सी आवाज।
रेणु को बहुत चैन मिला, “शाबाश !” उसे लगा उसके अपने गालों और योनि के अंदर की लाली बहुत बढ़ गई है। उसने संजना के कंधे छोड़ दिये।
जबरदस्ती घुसपैठ से संजना को दर्द हो रहा था, हालाँकि ज्यादा नहीं। वह बहुत ज्यादा डर गई थी, इसलिए चीख पड़ी थी। लेकिन वास्तविक प्रवेश इतना कष्टदायी नहीं था।
सुरेश धीरे धीरे अंदर सरक रहा था। पता नहीं क्यों संजना को घर की याद आ आई। माँ- बाबू- भाई सब इंतजार कर रहे होंगे। उन्हें गुमान भी न होगा कि इस वक्त वह क्या करा रही थी। अपने को कभी उसने गिरे हुए चरित्र की लड़की नहीं समझा था।
पर अभी जो हो रहा है वह क्या है? नहीं, नहीं… उसने कमर उचकाई, छूटने के लिए, मगर यह हरकत सुरेश को और आमंत्रित कर गई। सुरेश ने खुश होकर थोड़ा ताकत से धक्का दिया।
लिंग कौमार्य के पर्दे से जा टकराया।
रेणु ने इस चीख का मतलब पहचान लिया और उसके होंठों पर अपने होठ रख दिए। रोमांच से रेणु का शरीर अकड़ गया।
संजना को लगा वह धोखे में थी, यह केवल डर से उपजा दर्द नहीं है! वह सुरेश को ठेलकर छूटने की कोशिश करने लगी। सुरेश लगातार दबाव बनाए रहा। रेणु संजना का मुँह चूस रही थी, एक हाथ उसके स्तनों पर भी ले आई।
एक ऑपरेशन-सा चल रहा था, मरीज फीतों से बाँधकर जकड़ा था। संजना की चीखें रेणु के मुँह में घुट रही थीं। रेणु के बदन में सितार की झंकारें बेहद तेज हो गई थीं।
मुँह छुड़ाकर संजना ने एक जोर की साँस ली। और ठीक इसी क्षण सुरेश ने एक जोर की, बहुत ही जोर की टक्कर दी। टक्कर को सहने में संजना के पूरे शरीर का भार उस कोमल परदे पर आ गया।
कुदरत ने स्त्री की नियति को पूरा करते हुए उसके गर्भमुख पर से परदा उठा लिया। खून की एक धार अंदर से फूट पड़ी। सुरेश ने लिंग की जड़ को घेरती लाली की मोटी लकीर देखी और लिंग निकालकर रेणु को दिखलाया।
एक मोटा सा भाला जैसे गाढे लाल रंग में नहाया हुआ था। रेणु के मुँह से निकल पड़ा – “च्च च्च! हाय!”
खून देखकर संजना रोने लगी। रेणु ने उसके गाल थपथपाए – “पगली, बधाई हो!”
जा, चला गया। अब तक का सुरक्षित कौमार्य टूट गया। सुरेश पुनः लिंग अंदर डालने लगा। संजना गिड़गिड़ाई – “अब तो छोड़ दो।”
उत्तर में सुरेश ने लिंग अच्छी तरह घुसाकर विधिवत संभोग शुरू कर दिया। अंदर-बाहर, अंदर-बाहर। थप-थप-थप-थप… संभोग का संगीत, यौवन का संगीत, वासना का, लालसा का संगीत।
रेणु के तन-मन में यह संगीत प्रतिध्वनित हो रहा था। उसने सुरेश को चूमकर उसके पौरुष की सफलता की बधाई दी। झूमते हुए सुरेश ने लड़कियों की शुरू में कही गई बात की नकल उतारी – “दो दो को संभाल लोगे?”
संजना अभी योनि के दर्द से ही जूझ रही थी। आह, ऐसी कठोरता और वहशीपन को भला प्यार क्यों कहते हैं?
वह पा रही थी कि धीरे धीरे दर्द सहने लायक हो रहा है, घर्षण और चोट के बावजूद दर्द अब और बढ़ नहीं रहा है। कुछ देर बाद हल्का सा अच्छा भी लगने लगा।
“आह ओह, छोड़ दो…।” संजना ने फिर भी विनती की।
सुरेश गौर से उसके चेहरे को देखता हौले-हौले अंदर-बाहर कर रहा था।
संजना की रुलाई बंद हो चुकी थी। ये अच्छा लगना धीरे धीरे बढ़ता क्यों जा रहा है? इस आनंद को हरगिज कबूल नहीं करना है। भूलना नहीं है कि मेरे साथ जबरदस्ती हो रही है।
सुरेश बहुत धैर्य से धीरे-धीरे कर रहा था। योनि की संकुचन और धड़कन को नोट कर रहा था। रेणु के साथ एक बार स्खलित हो लेने के बाद संजना के साथ इच्छानुसार देर तलक टिकने की स्थिति में था।
संजना पर, न चाहते हुए भी, घर्षण का आनंद धीरे धीरे छाता जा रहा था। अभी जो माता-पिता परिवार की याद आ रही थी वह बंद हो गई। अपने आस-पास और वातावरण की चेतना भी लुप्त होने लगी।
खून, योनि द्रव, रिसता वीर्य – कसावट के बावजूद यह अभूतपूर्व चिकनी फिसलन संजना को बहुत मजा दे रही थी। उसने एक बार सिर उठाकर देखा, भग पीठिका मानों सूजकर फूल गई थी, उसको चीरता हुआ लिंग का डंडा अंदर-बाहर हो रहा था। दोनों के मिलने की जगह और इधर उधर फीके लाल रंग का चिपचिपा तरल लिथड़ा था।
संजना ने इसके लिए जिम्मेदार रेणु को देखा। नजर से गुस्सा जतलाना चाहा, पर तभी सुरेश ने जरा जोर की चोट दी, और “आ….ह” के साथ उसकी आँखें आधी मुंद गईं।
इस आह को सुनकर रेणु के अंदर छूटती फुलझड़ियाँ और तेज हो गईं। इसमें इनकार के साथ साथ पुकार-सी थी। सुरेश ने धक्कों की गति बढ़ा दी।
संजना अब विधिवत चुद रही है – देखकर रेणु अजब रोमांच में थी। । उसे आज ही अपनी इस विचित्रता – किसी कुमारी की ‘सील’ टूटते देखने की हसरत – का पता चला था। यह कहीं बहुत गहरे मन में दबी थी जो आज अनुकूल परिस्थिति में उभर आई थी। उसे झुरझुरी सी हो रही थी। लग रहा था कोई बुखार की सी सिहरन उसके तन-मन में से गुजर रही है। आनंद का कोई दरिया अपनी लहरों पर लहरों के नीचे उसे दबाता जा रहा हो।
संजना धीरे-धीरे अपनी, रेणु की होश खोने लगी। अपने साथ हो रहे जबरदस्ती की बात भूलने लगी। चेतना में रह गई सिर्फ एक बात – अपने ऊपर छाए पुरुष की, अपनी योनि में उससे मिल रहे पुरुषत्व के प्रतीक की। उसकी कमर चंचल हो रही थी। सुरेश की चोटें काफी थीं, फिर भी संजना की कमर उचक गई। इतने सुखद घर्षण को वह कैसे ना कहे।
और बादलों के अंदर से उगते सूरज की मद्धिम रोशनी सा उसके अंदर से कुछ फूटने लगा। लिंग का आवागमन मानों हवा के झोंकों की तरह बादलों को हटाकर उस प्रकाश को तेज कर रहा था। संजना को लग रहा था मानों उसके गर्भ के अंदर कोई सूरज उग रहा है। धीरे धीरे वह सूरज पूरा गोल और प्रखर हो गया।
अब और नहीं झेल सकती। संजना थक चुकी थी। उसने सुरेश को हटाने की कोशिश की।
‘अंदर मत करना।’ रेणु ने सुरेश को सावधान किया। वह संजना का माथा सहलाने लगी।
सुरेश हट गया। दोनों मिलकर मूर्छित संजना को देखते रहे। संजना के पसीने भीगे चेहरे और उसके रक्त भींगे योनि-प्रदेश के बीच एक अजब रिश्ता था।
सुरेश ने हाथ से करके अपने हाथ और लिंग पोछे।

कुछ क्षणों बाद रेणु ने संजना को उठाया- चलना नहीं है?”
संजना झट से उठने लगी।
“रुको रुको…” रेणु ने गमछे से उसकी पेड़ू को पोछा।
संजना ने देखा, सुरेश उसको ममता से देख रहा है। ‘आखिरकार इसने मुझे ले ही लिया, और पूरी कामयाबी से लिया।’ कुंठा और क्षोभ के मारे उसने सुरेश के गाल पर एक जोर का थप्पड़ मार दिया।
सुरेश कुछ नहीं बोला, उठकर चला गया। रेणु को गुदगुदी हुई, इस लड़की को ‘तोड़ने’ में वह सफल रही थी और यह थप्पड़ उसकी इस जीत की स्वीकृति थी। । उसने चड्ढी लाकर संजना को दे दी। संजना ने चड्ढी पाँवों में डाली और ऊपर खींच ली।

सुरेश बाहर से देखकर आया। सब ठीक था। बाहर कोई नहीं है। उन दोनों को निकलते कोई नहीं देखेगा।

दोनों साइकिल पर बैठीं तो सुरेश ने बाय किया। संजना उदास थी, रेणु प्रफुल्लित।
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