एक उपहार ऐसा भी-1

(Ek Uphar Aisa Bhi- Part 1)

This story is part of a series:

सभी कमसिन कलियों भाभियों और आँटियों को संदीप साहू का प्रेम भरा नमस्कार.
और सभी मित्रों को मेरा दोस्ती भरा अभिनंदन है।
अन्तर्वासना पर मेरे बहुत से नियमित पाठक और प्रशंसक हैं.

मेरी पिछली कहानी
गीत मेरे होठों पर
की तरह ही यह कहानी भी मेरे प्रशंसकों से ही जुड़ी हुई है।

आप सबने मेरे द्वारा लिखित सभी कहानियों को भरपूर प्यार दिया है, आशा है आगे भी आप सबका ऐसा ही प्यार मिलता रहेगा.

वैसे मुझे लगता है कि मेरी यह कहानी ज्यादा कामुकता और उत्तेजना से भरी होगी, लेकिन मेरा सोचना सही है या गलत ये आप मुझे मेल करके अवश्य बताएं।
क्योंकि आप लोगों के मेल आने पर ही अगली कहानी के लिए हौसला मिलता है. और लेखनी को निरंतर चलने का कारण मिलता है.

तो आप कहानी का आनन्द लीजिए।

मेरी इस कहानी की शुरूआत भी अन्तर्वासना की पाठिका द्वारा मेल पर चैट करने से होती है.

जब मेरी कहानी
आधी हकीकत आधा फसाना
प्रकाशित हुई थी तब मुझे बहुत से मेल आये थे, उन्हीं में से एक मेल खुशी का भी था।

आप तो जानते ही हैं मैं सभी मेल के जवाब देने की पूरी कोशिश करता हूँ. पर मैंने सोचा भी नहीं था कि शुरूआती बातचीत में ही खुशी से मेरी नजदीकी इतनी बढ़ जाएगी. यह नजदीकी सेक्स संबंध वाली नहीं थी. यह तो महज विश्वास की प्रगाढ़ता वाली नजदीकी थी।

कभी-कभी तो खुशी अपने मंगेतर के साथ बैठकर भी मुझसे चैट कर लेती थी.
उसने बताया कि ये उसकी असली आई डी है.
मैंने उससे कहा- तुम्हें डर नहीं लगता कि कोई तुम्हें ऐसे चैट करते जान ले।
खुशी ने कहा- सच में तुम बुद्धू ही हो।

उसका बुद्धू कहना मुझे बहुत ही अच्छा लगा.
क्योंकि लड़कियां सिर्फ उन्हें ही बुद्धू कहती हैं जिन पर वो अपना हक समझती हैं।
मैंने भी जवाब दिया- वो तो मैं हूँ ही! पर अभी मेरी किस बात से तुम्हें लगा कि मैं बुद्धू हूँ?

खुशी- यार सेक्स कहानी तुम लिखते हो, डरने की जरूरत तुम्हें होनी चाहिए। अपनी पहचान तुम्हें छुपानी चाहिए. मेरा क्या है .- मन हुआ तो बात कर ली. नहीं तो बाय-बाय. मेरा तो मंगेतर भी साथ देता है तुमसे बात करने के लिए. ऐसे भी एक और बात है जो मैंने तुमको नहीं बताई है, और ना ही कभी बताऊंगी।

उसकी इस बात को मैंने सामान्य ढंग से ही लिया. पर मैं दिखाना चाहता था कि उसकी हर छोटी-बड़ी बातों से मुझे फर्क पड़ता है. इसीलिए मैंने जोर देते हुए उससे बात जाननी चाही.
तब भी उसने कुछ नहीं बताया तो मैंने उसे अपनी कसम देते हुए बात बताने को कहा।

इस बार उसे झुकना पड़ा और उसने सारी बात बता दी.
उसने कहा कि वो पहले भी मुझसे फेंक आई डी बनाकर चैट कर चुकी है. पर उस आई डी का कम उपयोग होने से पासवर्ड भूल गई. फिर मुझे भरोसे का आदमी जानकर ही उसने रियल आई डी से बातचीत शुरू की है.

उसने बात आगे बढ़ाते हुए कहा- मैं ये बात तुम्हें कभी नहीं बताने वाली थी. पर तुमने जिद कर दी और कसम दे दी तो मुझे बताना पड़ा।

मैं खुश था. मेरे खुश होने की दो खास वजह थी. पहली ये कि मैंने किसी का भरोसा अपनी सहज प्रकृति से जीत लिया था. और दूसरी वजह यह थी कि डिजीटल दुनिया में भी कोई मुझे इतना अपना समझती थी कि उसे मेरी कसम की परवाह थी. वरना हम कामुक कहानी लेखकों को तो लोग गिरा हुआ समझकर हेय दृष्टि से ही देखते हैं।

मैंने उससे पूछा- तुमने किस नाम से आई डी बनाई थी? मुझे भी तो बताओ? आखिर मैंने तुम्हें क्या समझ कर चैट किया था मैं भी तो जानूं!

इस बार खुशी ने मुझे अपनी कसम दे दी- देखो संदीप, तुम्हें मेरी कसम है तुम दुबारा कभी ये सवाल नहीं करोगे, और जब बताना होगा मैं ही तुम्हें सारी सच्चाई बता दूंगी।
अब मुझे शांत रहना पड़ गया.

पर मन ही मन मैंने जितने लोगों से चैट की थी, सबके कनेक्शन खुशी से जोड़कर देखने लगा. पर कोई फायदा ना हुआ. और कुछ समय या कुछ दिन बाद मैंने बेनतीजा ही सोचना छोड़ दिया।

हमारी बातचीत शालीनता से होती थी. जैसे हम एक सामान्य जान पहचान वाले दोस्त हों.
खुशी की भाषा शैली भी संयमित और परिपक्व और ऊंचे स्तर की लगती थी.

जब हमारे बीच बातचीत का दौर बढ़ गया तब मैंने उसे देखने की इच्छा जाहिर की।
उसने कहा- मैं तुम्हें अपनी तस्वीर भेज तो सकती हूँ पर भेजूँगी नहीं. क्योंकि इसके लिए मुझे मंगेतर ने मना किया है. हाँ पर मैं जब मंगेतर के साथ रहूं तब तुमसे हैंगआऊट में विडीयोकॉल पर बात कर सकती हूँ।

मैंने कहा- ठीक है. मैं उस वक्त का इंतजार करूंगा.
सच कहूं तो इंतजार के अलावा मेरे वश में कुछ था भी नहीं.

मैंने उससे उसकी शादी के बारे में पूछा तो उसने कहा- मेरे और वैभव के घर वाले पुराने परिचित हैं. और हम दोनों के बीच भी नजदीकी है. ऐसा सोचकर घर वालों ने हमारी मंगनी करा दी. पर अभी वैभव के लिए एक बिजनेस प्रोजेक्ट को पूरा किया जा रहा है उसी के बाद शादी होगी।

मैंने ‘वोहहह’ कहते हुए फिर पूछ लिया- फिर भी कितना इंतजार करना होगा हमारी खुशी को खुशी के लिए?
तो उसने कहा- शायद दो एक साल और लगेंगे. या जल्दी भी हो जाए. वैसे मेरी शादी कभी भी हो, तुम्हें जरूर बुलाऊँगी, तुम आओगे ना?

मैंने कहा- तुम बुलाओ और मैं ना आऊं ऐसा सोचना भी नहीं, बुलाने के लिए धन्यवाद।

अब खुशी और मैं एक दूसरे को समझने लगे थे. पर खुशी को जब बात करने का मन होता था, तभी वो मेरे से बात करती थी. पर कई बार वो लंबे दिनों तक गायब भी हो जाती थी. तब मैं अपनी कहानियों में या अन्य चैटिंग फ्रेंडस में व्यस्त हो जाता था।

खुशी के साथ अब मेरी बात हैंगआऊट पर होने लगी. उसने कभी मुझे मेरी पिक नहीं मांगी. ना ही मैंने बिना मांगे उसे अपनी पिक दिखाई.
लेकिन मैं उसे रोमांटिक पिक जरूर भेजा करता था. जिनमें अश्लीलता ना होकर सच्चे प्रेम का अहसास छुपा होता था. खुशी उनकी तारीफें भी किया करती थी।

खुशी और मेरी चैटिंग के बहुत पहले से कुसुम नाम की एक अन्य महिला से मेरी सेक्स चैट होती थी. वो बहुत बोल्ड और ओपन माइंड लेडी थी. वो फोन सेक्स के वक्त वाइल्ड तरीके को पसंद करती थी. वो बहुत ही ज्यादा खतरनाक तरीके की पिक भेजा करती थी.
उसने कभी भी अपनी रीयल पिक नहीं भेजी थी. वो कहती थी कि ये डीजिटल सेक्स की दुनिया है प्यारे. इसमें हकीकत की चाह करना भी बेवकूफी है।

मैं उसकी बातों से सहमत भी था इसलिए मैंने कभी जिद नहीं की. ऐसे भी हर इंसान की सोच अलग-अलग होती है।

मुझे कुसुम के साथ सेक्स चैटिंग करना भी बेहद पसंद था. लेकिन खुशी के साथ सच्चे प्यार और रोमांस वाली फिलिंग आती थी जिसे मैं कभी खोना नहीं चाहता था.
इसलिए खुशी को कभी सेक्स चैट के लिए नहीं उकसाया।

ऐसा नहीं है कि उसके लिए मेरे दिल में कोई अरमान नहीं था. पर दिल के अरमानों को पूरा करने के लिए मैं खुशी की तरफ से पहल का इंतजार कर रहा था.
लेकिन वो थी कि मुझसे अच्छी दोस्ती करके ही खुश रहती थी।

कभी-कभी मैं खुशी को अपने सेक्स पार्टनर के रूप में महसूस करने के लिए तड़प उठता था. तब मैं कुसुम को मैसेज करता था.
मुझे तुरंत जवाब भी मिल जाता था.
और मैं कुसुम को ही खुशी की जगह रखकर अपने दिल को तसल्ली पहुंचा लेता था. इस बात की भनक भी मैंने कभी कुसुम को होने नहीं दी थी।

एक बार ऐसे ही बहुत दिन बीत गए. पर खुशी का कोई मैसेज नहीं आया. मैं कुसुम से ही बातें करके मन बहला रहा था.

इसी बीच मैंने एक और बेहतरीन कहानी
गलतफहमी
पूरी कर ली.
और उसका प्रकाशन भी हो गया, जिसे पढ़कर आप सभी पाठक पाठिकाओं द्वारा प्रशंसा के खूब संदेश आए।

कुसुम ने भी कहानी की जमकर तारीफ की. उसने कहानी की नायिका की जगह खुद को रखकर मुझसे जमकर सेक्स का आनन्द लिया।
कहानी की लगभग अंतिम कड़ियां प्रकाशित हुई थी, तभी मुझे खुशी के मैसेज ने खुश कर दिया।

खुशी ने मैसेज करके कहा- आपने कोई नई कहानी अन्तर्वासना पे अपलोड की है क्या?
मैंने खुश होकर कहा- हाँ, तुमने पढ़ी क्या? कैसी लगी?

खुशी ने जवाब दिया- मैंने नहीं पढ़ी, मुझे कहानी पढ़ना अच्छा नहीं लगता।
मेरा मन बैठ गया.

मैंने कहा- मैंने तो सोचा था कि जब पहली बार तुमने मेरी कहानी पढ़ी होगी और तुम्हें मेरी कहानी अच्छी लगी होगी. तभी तुमने उसके नीचे दिए मेरे मेल पते पर मैसेज किया है।
उसने कहा- हाँ पहले वाली कहानी के कुछ भाग मैंने पढ़े थे और उन्हीं के नीचे से मैंने तुम्हारी मेल आई डी लेकर मैसेज किया था. लेकिन वो कहानी भी मैंने अन्तर्वासना पर नहीं पढ़ी थी।

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था, मैंने कहा- अगर अन्तर्वासना में नहीं पढ़ी तो फिर कहां पढ़ी मैंने तो और कहीं भेजी ही नहीं?
उसने फिर कहा- अरे बुद्धू, मेरी एक सहेली है जो अन्तर्वासना की दीवानी है. उसने ही कहानी पसंद आने पर मेरे व्हाटसप में शेयर किया था. और अभी भी उसने ही मुझे बताया है कि तुमने नई कहानी अपलोड की है।

अब मामला समझ आ गया था, मैंने कहा- तो तुम मेरी कहानियां नहीं पढ़ती!
तो उसने कहा- मैं तुम्हें पढ़ती हूँ! और मुझे लगता है जो तुम्हें पढ़ ले उसे किसी कहानी को पढ़ने की कोई जरूरत नहीं।

मैडम मेरी प्रशंसा में अतिश्योक्ति अलंकार का प्रयोग कर रही थी. पर मुझे इस विषय को लंबा खींचना अच्छा नहीं लगा.
मैंने कहा- अच्छा इस बात को छोड़ो. तुम ये बताओ कि इतने दिन दिन कहां थी?

उसने कहा- बस यार, घर पर शादी की तारीख को लेकर बात हो रही है. शादी की तैयारी भी शुरू हो गई है. लगता है तीन महीने बाद फरवरी में शादी होगी. तुम फरवरी में अपना समय निकाल के रखना तुम्हें आना ही है।

मैंने भी खुश होते हुए हाँ कहा और उसे अग्रिम बधाई भी दी.
फिर डेट फाइनल होने पर सूचित करने को कहा. और ये भी पूछा- तुम रहती कहां हो? शादी कहां होगी, मुझे आना कहां है? तुम घर पर मेरा क्या परिचय दोगी?
ढेरों सवाल मैंने एक सांस में ही कर डाले।

उसने कहा- यार, तुम इतना क्यों सोचते हो, मैं हूँ ना! जब मैं तुम्हें अपना मेहमान बनाकर बुला रही हूं तो मुझे भी तो इतनी चिंता होगी. मैं जब तुम्हें शादी का कार्ड भेजूँगी तब तुम्हें सब बता दूंगी।

मैंने कहा- अच्छा ठीक है, तुम ही जानो!
और साथ ही उसे देखने की मांग दोहरा डाली।

उसने भी कहा- अरे सॉरी यार मैं तो भूल ही गई थी, अभी तो वैभव के साथ मैं काफी वक्त बिता रही हूँ, कल तुमसे विडियोकॉल पर बात करती हूँ।

खुशी से हुई बातचीत से मैं बहुत ज्यादा खुश हो गया क्योंकि आजतक मैं खुशी से मुलाकात की बातों पर पूरा यकीन नहीं कर रहा था.
पर अब लगने लगा कि सच में मेरी मुलाकात खुशी से हो सकती है.

यहां पर मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि खुशी के साथ किसी प्रकार के शारीरिक संबंध के बारे में मेरे मन में विचार तक नहीं आया। और ना ही मैंने कभी खुशी के सामने अपने प्रेम का ही इजहार किया था. क्योंकि मेरे लिए तो उसका दोस्ताना व्यवहार ही काफी था. मैं अपने प्रेम को अपने अंदर समेटे खुशी के बहाने अपनी प्रेमिका को महसूस कर लेता था. जिसमें आज भी मेरी जान बसती है. पर उससे बात तो हो नहीं पाती, तो बस मैं खुशी की खुशियों का जरिया बनाकर अपने को सुकून पहुंचा लेता था।

मैंने खुशी से ना ही उसकी उम्र पूछी थी, और ना ही शरीर का नाप! और ना ही कोई अन्य जानकारी जो सामान्यतः हम सेक्स चैट या नये दोस्त बनाने के समय मांग लेते हैं.
ये सब नहीं पूछने का एक कारण यह था कि मैंने कुछ बातों से इन चीजों का अंदाजा लगा लिया था. जैसे अभी उसकी शादी हो रही है मतलब वो बाइस पच्चीस साल की लड़की होगी, बातचीत का सलिका उसके अच्छे घर घराने का परिचय देता था।

और दूसरी बात ये थी कि मुझे पूरी उम्मीद थी कि एक वक्त ऐसा आयेगा कि इन बातों की जानकारी मुझे मिल ही जायेगी, यही सोचकर मैंने कभी कुछ नहीं कहा।

दूसरे दिन मैंने अच्छे कपड़े पहने ताकि विडियोकॉल पर अच्छा दिख सकूं.
मैं 35 वर्ष का अनुभवी इंसान होकर भी किशोरावस्था की तरह खुश हुआ जा रहा था. पता नहीं खुशी से इतना लगाव मुझे क्यों हो गया था.
मैं उसके विडियोकॉल की निरंतर प्रतिक्षा कर रहा था।

प्रभात ने साथ छोड़ दिया, दोपहर निकलने लगी, फिर शाम भी ढलने लगी, रात भी गहराने लगी, पर विडियोकॉल नहीं आया.
मैंने बार बार फोन हाथ में उठाया और कॉल करने का मन बनाया. पर मेरे दिल ने कहा- संदीप, तुम ऐसे धीरज खो दोगे तो पता नहीं खुशी पर कोई अड़चन ना आ जाये!
और मैंने कॉल नहीं किया।

लेकिन मेरी नजर मोबाइल से हट ही नहीं रही थी.

फिर रात को दस बजे खुशी तो नहीं पर कुसुम का मैसेज आया. पर आज मुझे उससे बात करने का बिल्कुल मन नहीं हो रहा था।
मैंने कहा- आज मैं बात नहीं कर पाऊंगा.
तो उसने कहा- ठीक है तुम जैसा ठीक समझो, पर कोई परेशानी हो या मुझसे कोई नाराजगी हो तो मुझसे शेयर कर सकते हो, और नहीं करना चाहोगे तो भी कोई दबाव नहीं है।

खुशी से बात ना होने पर होने वाले दर्द को मैंनो महसूस किया था और वही दर्द मैं कुसुम को नहीं देना चाहता था, इसलिए मैंने बात करना शुरू किया।

खुशी और संदीप की प्रेम कहानी, संदीप और कुसुम की डिजिटल सेक्स कहानी जारी रहेगी.
आपको कहानी की शुरुआत कैसी लगी, आप अपनी राय इस पते पर दे सकते हैं।
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