सुलगते जिस्म-1

This story is part of a series:

झांसी एक एतिहासिक नगर है, वहां के रहने वाले लोग भी बहुत अच्छे हैं … दूसरों की सहायता तहे दिल से करते है। मेरे पति के साथ मैं झांसी आई थी।

मेरे पति की नौकरी झांसी से लगभग 10 किलोमीटर दूर बी एच ई एल में थी, हम भोपाल से स्थानान्तरित होकर झांसी आये तो सबसे पहले हमने वहां किराये का मकान ढूंढा और जल्दी ही हमें कॉलोनी में मकान मिल भी गया। मकान मालिक ने अपने लड़के सुनील को हमारी सहायता के लिये लगा दिया था।

पहले दिन तो खाना वगैरह का इन्तजाम तो उसने ही कर दिया था। बड़ा ही हंसमुख था वो।

यह बात अलग है कि उसका इरादा आरम्भ से ही बहुत नेक था। एक जवान लड़की सामने हो तो उन्हें अपना मतलब पहले दिखने लगता था। मैं उसकी नजरें तो समझ चुकी थी पर वो ही तो एक हमारा मदद करने वाला था, उसे मैं छोड़ती कैसे भला।

एक-दो दिन में उसने हमारी घर की सेटिंग करवा दी थी और शायद वो भी अपने आप की सेटिंग मुझसे कर रहा था। उसे देख कर मुझे बड़ा ही रोमांच सा हो रहा था।

ललितपुर से सामान भी शिफ़्ट करना था। नई जगह थी सो मेरे पति ने सुनील को दो तीन दिन रात को घर पर सोने के लिये कह दिया था। उसकी तो जैसे बांछें खिल गई …

उसे मेरे समीप रहने का मौका मिल गया था। शाम को सुनील उन्हें अपनी मोटर बाईक पर बस स्टेण्ड छोड़ आया था। शाम ढल चुकी थी। जब वो लौट कर आया तो साथ में झांसी के सैयर गेट के मशहूर नॉन-वेज कवाब और बिरयानी भी ले आया था। सुनील का व्यवहार बहुत ही अच्छा था।

नये मकान में मैं घर पर अकेली थी और सुनील की नजरें मुझे आसक्ति से भरी हुई बदली हुई लग रही थी। मुझे भी अपने अकेले होने का रोमांच होने लगा था कि कहीं कोई अनहोनी ना हो जाये, जिसकी वजह से मेरा दिल भी धड़क रहा था।

जब दो भरी जवानियां अकेली हों और वो प्यासी भी हों तो मूड अपने आप बनने लगता है। मेरे दिल में भी बेईमानी भरने लगी थी, दिल में चोर था, सो मैं उससे आंखें नहीं मिला पा रही थी। उसकी तरफ़ से तो सारी तरकीबें आजमाई जा रही थी, बस मेरे फ़िसलने की देर थी।

पर मैंने मन को कठोर कर रखा था कि मैं नहीं फ़िसलूंगी। उसका लण्ड भी जाने क्या सोच सोच कर खड़ा हो रहा था जिसे मैं उसके पतले झीने पजामें में से उभार लिये हुये देख सकती थी। उसका प्यारा सा लण्ड बार बार मेरा मन विचलित किये दे रहा था। मेरा मन डोलने लगा था, मैंने अपनी रात के सोने वाली ड्रेस यानि ढीला सा गुलाबी पजामा और उस पर एक ढीला ऊंचा सा टॉप … अन्दर मैंने जानबूझ कर कोई पेण्टी या ब्रा नहीं पहनी थी। मतलब मात्र उसे मेरे स्तनों को हिला हिला कर रिझाना था, ताकि वो खुद ही बेसब्री में पहल करे। यूँ तो मेरा दिल यह सब करने को नहीं मान रहा था पर जवान जिस्म एक जवान लड़के को देख कर पिघल ही जाता है, फिर जब दोनों अकेले हों तो, और किसी का डर ना हो तो मन में यह आ ही जाता है कि मौके का फ़ायदा उठा लो … जाने ऐसा मौका फिर मिले ना मिले। आग और पेट्रोल को पास पास रख दो और यह उम्मीद करो कि कुछ ना हो।

सुनील भी मेरे पास पास ही मण्डरा रहा था। कभी तो मेरे चूतड़ों पर हाथ छुला देता था या फिर मेरे हाथों को किसी ना किसी बहाने छू लेता था। मेरे दिल में भी इन सब बातों से आग सी सुलगने लगी थी। वासना की शुरूआत होने लगी थी।

खाना भी ठीक से नहीं खाया गया। वो तो बस मेरे टॉप में से मेरे स्तनों को बार बार देखने की कोशिश कर रहा था। अब मुझे भी लग रहा था कि नीचे गले का टॉप क्यूँ पहना, पर दूसरी ओर लग रहा था कि इस टॉप को उतार फ़ेंक दूँ और अपनी नंगी चूचियाँ उसके हाथों में थमा दूँ।

रह रह कर मेरे बदन में एक वासना भरी सिरहन दौड़ जाती थी।

रात को वो मेरे कमरे में बातें करने के बहाने आ गया था, पर उसके चेहरे के नक्शे को मुझे समझने में जरा भी मुश्किल नहीं आई। वासना उसके चेहरे पर चढ़ी हुई थी। मैं बार बार नजरें चुरा कर उसके मोहक लण्ड के उभार को निहार लेती थी। बातों बातों में वो मुझे लपेटने लगा, और मैं उसकी बातों में फ़िसलने लगी।

मेरे झुकने के कारण मेरे मेरे टॉप में से स्तन भी बाहर छलके पड़ रहे थे। उसकी नजरें मेरे स्तन का जैसे नाप ले रही हो। मेरा दिल अब काबू में नहीं लग रहा था। बदन में झुरझुरी सी उठ रही थी।

“भाभी, लड़कों को लड़कियाँ इतनी अच्छी क्यूँ लगती हैं? चाहे वो शादीशुदा ही क्यूँ ना हो?”

“विपरीत सेक्स के कारण … लड़का और लड़की प्रकृति की ओर से भी एक दूसरे के लिये पूरक माने जाते हैं।” मैंने उसे उसी के तरीके से समझाया, ताकि वो मुझे ही अपना पूरक माने।

“भाभी, फिर भी लड़कियों के हाथ, पांव और जिस्म में बड़ा ही आकर्षण होता है, जैसे ये आपके ये पांव … ” सुनील ने अपना हाथ मेरे चिकने पांव पर फ़ेरते हुए कहा।

मेरा मन लरज उठा, जैसे किसी ने करण्ट लगा दिया हो। मेरी योनि में जैसे एक अजीब कुलबुलाहट सी हुई।

“अरे छू मत … मुझे कुछ होता है … !” मैंने अपने हाथ से उसका हाथ हटा दिया।

उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। मुझे बड़ा भला सा लगा। उसके हाथ ने मेरे कोमल हाथों को हल्के से इशारा देते हुये दबा दिया।

“आपके ये हाथ कितने चिकने हैं … ! “

‘ तू क्या कर रहा है सुनील … कोई देख लेगा तो बड़ी बदनामी हो जायेगी … “

अन्दर ही अन्दर मैं पिघलने सी लगी … मैंने कोई विरोध नहीं किया।

“भाभी हम तुम तो अकेले हैं ना … कौन देखेगा … बस आप इतनी सुन्दर है तो, बदन इतना चिकना हो तो … बस एक बार हाथ से छूने दो प्लीज … !” उसका हाथ मेरे कंधे तक आ गया।

“नहीं कर ना … हाय रे … उनको पता चलेगा, मैं तो मर ही जाऊंगी … !” मैंने अपने जवाब को लगभग हां में बदलते हुये कहा, जिसे कोई भी समझ जाता। यानि कुछ भी करो पर पता नहीं चलना चाहिये।

“भाभी, भाई साहब तो ललित पुर चले गये हैं … कैसे पता चलेगा !” वो अब मेरे और पास आ गया था उसकी सांसे तेज हो उठी थी। मेरा दिल भी धाड़ धाड़ करके धड़कने लगा था।

“देख, बस हाथ ही लगाना … ” उसे मन्जूरी देते हुये कहा … मन में तो मैं अब चाह रही थी कि बस मुझे छोड़ना मत … बस चोद चोद कर मुझे निहाल कर देना।

“भाभी किसी लड़की को मैं पहली बार हाथ लगा रहा हूँ … कुछ गलती से हो जाये तो बुरा मत मानना !”

“हाय तू ये क्या कह रहा है … हाय रे ! मैं मर गई … सुनील गुदगुदी हो रही है …! ” मुझे उसके हाथ लगाते ही झटका सा लगा, पर मर्द का हाथ था … मेरी चूंचियां कड़ी होने लगी … निपल कठोर हो गये … उसका हाथ मेरी चिकनी पीठ को सहला रहा था। उसने मेरा ढीला टॉप नीचे से उठा दिया था। उसका हाथ मेरी पीठ पर फ़िसलते हुये मेरी चूंचियों को छूने लगा था। धीरे धीरे मुझे लगने लगा कि वो मेरी चूंचियाँ मसल डाले। वो अपना हाथ तो चूंचियों पर लगाता और झटका चूत पर पड़ता था, वो गीली होने लगी थी। जो पहले चुद चुकी हो उसे तो सीधे चुदने की ही लगती है ना … इतना करना तो खुलने के लिये बहुत होता है … बस यही हाल मेरा हो रहा था। उसके हाथ अब मेरी चूचियों को सहलाने में लगे थे। अब मेरा मन जल्दी से चुद जाने को कर रहा था।

“सुनील, एक बात कहूँ … ” मैंने झिझकते हुये कहा, मेरे मन उसका लण्ड पकड़ने का कर रहा था।

“जरूर कहो … बस ये सब करने के लिये मना मत करना … “

“नहीं, इसमें तो मुझे भी मजा आ रहा है … पर आपका वो … मुझे भा रहा है … क्या उसे छू लूँ … ” कह कर मैंने अपना चेहरा नीचे कर लिया। वो पहले तो समझा नहीं …

पर जब मैंने हाथ बढ़ा कर धीरे से लण्ड पकड़ लिया तो उसके मुख से आनन्द के मारे सिसकी निकल पड़ी। पर हाय रे … लण्ड तो गजब का लम्बा था। सात इन्च तो होगा ही … और मोटा … हां, उनसे ज्यादा मोटा था। उसे हाथ लगाते ही, उसकी मोटाई और लम्बाई का अहसास होने लगा। मेरा दिल धड़क उठा। मेरे मन में आया कि इतना मोटा लण्ड मेरी चूत या गाण्ड में समा जायेगा क्या ? फिर भी मेरा दिल मचल उठा उसे अपनी चूत में उसे लेने के लिये।

मैंने उसका लण्ड दबाकर ज्योंही मुठ मारी, सुनील तड़प उठा। मुझे अपने पति का लण्ड याद आ गया, सुनील का लण्ड मेरे पति के लण्ड से मोटा और लंबा था। पर वो चोदते बहुत प्यार से थे … अपना माल समझ कर … ।

अब उसने मेरी टॉप को ऊपर से खींच कर उतार दिया। पंखे की ठण्डी हवा से मेरा जिस्म सिहर उठा। मेरे कड़े निपल उसकी अंगुलियो में भिंच गये और वो उसे दबा दबा कर घुमाने लगा। मेरी चूत में उत्तेजना भरती जा रही थी। तभी मुझे ख्याल आया कि दरवाजा खुला है।

“हटो तो … दरवाजा खुला है … !” मैं लपक कर गई और दरवाजा बंद कर दिया।

“अरे कौन आयेगा … !” और उठ कर मुझे पीछे से कमर पकड़ कर भींच लिया। इसी के बीच में मुझे अहसास हुआ कि उसका लम्बा लण्ड मेरी चूतड़ों की दरारों के बीच जोर लगा रहा था, जैसे गाण्ड में घुसना चाह रहा हो। मुझे उसके अपने चूतड़ों के बीच लण्ड की मोटाई का अनुभव होने लगा था।

“अरे ये क्या कर रहे हो … बात तो बस छूने की थी … !” मैंने आनन्द लेते हुये कहा … उसके ऐसा करने से मेरे पति जब मेरी गाण्ड मारते थे, उसके आनन्द की याद ताजा हो गई थी। तभी सुनील ने मेरा पजामा नीचे जांघो तक खींच दिया और खुद का भी पाजामा नीचे खींच कर लण्ड बाहर निकाल लिया।

“हाये रे … सुनील … बस हटो … ये मत करना … !” अपने नंगे होने से मुझे बेहद आनन्द आया। किसी दूसरे मर्द के सामने नंगा होने का मजा बहुत ही प्यारा होता है।

“भाभी, प्लीज अब मत रोको मुझे … मुझसे नहीं रहा जा रहा है !” और वो अपना लण्ड मेरी चूतड़ों की चिकनी दरारों के बीचों बीच समाने लगा। चूतड़ों के पट के बीच लण्ड चीरता हुआ गाण्ड के छेद से जा टकराया।

“हाय रे, सुनील, तुम तो मेरी इज़्ज़त लूट लोगे …! ” मैंने हाथ बढ़ा कर उसके चूतड़ों को थाम कर अपनी गाण्ड की ओर दबा लिया। मुझे गाण्ड के छेद में गुदगुदी सी होने लगी … । गाण्ड के चुदने की याद से ही मेरा बदन आग होने लगा।

“इज्जत लूटने में मजा है … हाय रे भाभी … वो किसी ओर में कहां ?”

“आह्ह्ह्ह , घुस गया रे अन्दर … उईईईईईई … मेरी इज्जत लूट ली रे … !” लण्ड गाण्ड में घुस चला था।

“नहीं मेरी इज्जत लुटी है … भाभी … मुझे आपने लूट लिया … मेरा लण्ड भी ले लिया !” लण्ड का नाम सुनते ही मुझे बहुत अच्छा लगा।

“सुनील … लूट ले रे … मुझे पूरा ही लूट ले … लुटने में मजा आ रहा है !” उसका लण्ड मेरी गाण्ड में घुस चुका था, वो अपना थूक लगाता जा रहा था और गाण्ड में लण्ड अन्दर घुसेड़ता जा रहा था। मुझे तो जैसे सारा जहां मिल गया था।

अभी गाण्ड चुद रही है तो फिर चूत भी चुदेगी, मेरे शरीर को मसल मसल मस्त कर देगा … मेरा सारा पानी निकाल देगा … हाय रे तीन दिनों तक चुदा चुदाकर मुझे तो स्वर्ग ही मिल जायेगा। मुझमें जोश भरता गया। मैं बेसुध हो कर गाण्ड मरवाने लगी … मेरी चूत में आग लगी हुई थी। मेरी चूचियां मसल मसल कर बेहाल हो गई थी, उसके कठोर हाथों ने उसे लाल कर दिया था। उसके लण्ड ने गति पकड़ ली थी। मेरी गाण्ड तबियत से चुदी जा रही थी। मैंने भी अपने चूतड़ हिला हिला कर उसे चोदने में सहायता की। मेरी चूतड़ों के गोल गोल चिकनी गोलाईयों से उसके लण्ड के नीचे पेड़ू टकरा रहे थे … जो मुझे और उत्तेजित कर रहे थे। उसे मेरी तंग गांड चोदने में बड़ा आनन्द आ रहा था पर मेरी तंग गाण्ड ने उसको जल्दी ही चरम सीमा पर पहुंचा दिया और उसका माल छूट गया।

पर मेरी चूत चुदने की राह में पानी छोड़ रही थी। वो मेरी चूतड़ों पर अपना वीर्य मारने लगा और उसे पूरी गीला कर दिया। उसका लण्ड अब सिकुड़ कर छोटा हो गया था। वो पास में पड़ी कुर्सी पर हांफ़ता हुआ सा बैठ गया। मैंने जल्दी से अपना पजामा ऊपर किया और टॉप पहन लिया। थोड़ी ही देर मैंने दूध गरम करके उसे पिला दिया। नई जवानी थी … कुछ ही देर में वो फिर से तरोताज़ा था।

मेरी चूत को अब उसका लंबा और मोटा लौड़ा चाहिये था। उसके लिये मुझे अधिक इन्तज़ार नहीं करना पड़ा।

वह सब अगले भाग में !

आपकी नेहा

What did you think of this story??

Click the links to read more stories from the category पड़ोसी or similar stories about

You may also like these sex stories

Download a PDF Copy of this Story

सुलगते जिस्म-1

Comments

Scroll To Top