दीदी, जीजाजी और पारो-2

प्रेषिका – पिंकी सेक्सी

प्रथम भाग से आगे …

पारो: अभी करो ना। देखो तेरा ये फिर से खड़ा होने लगा है।

मैं: हाँ, लेकिन तेरी चूत का घाव अभी हरा है, मिटने तक राह देखेंगे, वर्ना फिर से दर्द होगा और ख़ून निकलेगा।

मेरा लंड फिर से तन गया था। पारो ने उसे मुट्ठी में थाम लिया और बोली: होने दो जो होवे सो। मुझे ये चाहिए।

मैं ना कैसे कहूँ भला? मुझे भी चोदना था। मैंने किताब निकाली। इनमें एक तस्वीर ऐसी थी जिसमें आदमी नीचे लेटा था और औरत उसकी जाँघों पर बैठी थी। मैंने ये तस्वीर दिखाकर कहा: तू ऐसा बैठ सकोगी?

पारो: हाँ, लेकिन इसमें आदमी का वो कहाँ है?

मैं: वो औरत की चूत में पूरा घुसा है, इसलिए दिखाई नहीं देता। आ जा।

मैं चित्त लेट गया। अपने पाँव चौड़े कर वो मेरी जाँघों पर बैठ गई, मैंने लंड सीधा पकड़ रखा था। उसने चूत लंड पर टिकाई। आगे सिखाने की ज़रूरत नहीं थी. कूल्हे गिरा उसने लंड चूत में ले लिया। लंड और चूत दोनों गीले थे इसलिए कोई दिक्कत ना हुई। पूरा लंड घुस जाने पर वो रुकी। लंड ने ठुमका लगाया। उसने चूत सिकोड़ी। नितम्ब उठा गिरा कर वो चोदने लगी।

चौड़े किए गए भोस के होंठ और बीच में तने भग्नों को मैं देख सकता था। मैंने अँगूठा लगाकर उसके भग्न सहलाए। आठ-दस धक्के में वो थक गई और मुझ पर ढल पड़ी।

लंड को चूत में दबाए रख मैंने उसे बाँहों में भर लिया और पलट कर ऊपर आ गया। तुरन्त उसने जाँघें पसारीं और ऊपर उठा लीं। दो-तीन धक्के मार कर मैंने पूछा: दर्द होता है?

पारो ने ना कही। मैं धीरे-गहरे धक्के से चोदने लगा। पूरा लंड निकालता था और घकच्च से डाल देता था। पारो अपने नितम्ब हिलाने लगी और मुँह से सी… सी… सी… करने लगी। योनि में फटाके होने लगे। मैंने धक्के की रफ्तार बढ़ाई।

वो बोली: उसस्सससस्सस… उस्सस्सससस मुझे कुछ हो रहा है रोहित, ज़ोर से चोदो मुझे।

मैं घचा छच्च्चच, घचा घच्चचचच धक्के से उसे चोदने लगा।

अचानक वह झड़ पड़ी। पर मैं रुका नहीं, धक्के देता चला। वो बेहोश सी हो गई। झड़ना शान्त होने पर उसकी चूत की पकड़ कम हुई। मैंने अब धीरे से पाँच-सात गहरे धक्के लगाए और अन्त मे लंड को चूत की गहराई में पेल कर ज़ोर से झड़ा।

एक-दूसरे से लिपट कर हम दोनों थोड़ी देर तक पड़े रहे। इतने में दीदी और जीजू आ गए। फटाफट हमने ताश की बाज़ी टेबल पर लगा दी। जब जीजू ने पूछा कि हमने क्या किया तो पारो ने फिर मुँह बिचकाया- हुँह… कहते हुए।

मैंने कहा: हम ताश खेल रहे थे, पारो एक बार भी नहीं जीती।

रात का खाना खाकर सब सो गए। आज पहली बार पारुल अपने भैया से अलग कमरे में सोई। मैं बिस्तर पर पड़ा, लेकिन नींद नहीं आई। सोचने लगा, क्या मैंने पारो को चोदा था, या कोई सपना था? उसकी चूत याद आते ही नर्म लौड़ा उठने लगता था और उसमें हल्का सा मीठा दर्द होता था। दर्द से फिर लौड़ा नर्म पड़ जाता था। इससे तसल्ली हुई कि वाक़ई मैंने पारो को चोदा ही था।

और दीदी और जीजू सारा दिन कहाँ गए थे? वापस आने पर दीदी इतनी खुश क्यूँ दिखाई दे रही थी। उसके चेहरे पर निखार क्यूँ आ गया था? जीजू भी कुछ गुनगुना रहे थे। और आज की रात जब पारो बीच में नहीं है तो जीजू दीदी को चोदे बिना छोड़ेंगे नहीं। मुझे पारो की भोस याद आ गई। दीदी की ऐसी ही थी ना? जीजू का लंड कैसा होगा? पारो को चोदने का मौक़ा कब मिलेगा? विचारों की धारा के साथ मेरा हाथ भी लंड पर चलता रहा। दीदी की और पारो की चुदाई सोचते-सोचते मैं झड़ पड़ा। नींद कब आई उसका पता न चला।

दूसरे दिन जीजू को तीन दिन वास्ते बाहर गाँव जाना हुआ। मैंने दीदी से पूछा कि वो लोग कहाँ गए थे। मुस्कुराती हुई वो बोली: रोहित, ये सब तेरी वज़ह से हो सका। तू था तो पारो ने हमें अकेले जाने दिया। हम गए थे अहमदाबाद। एक अच्छी सी होटल में। सारा दिन खाया-पिया, इधर-उधर घूमे और…

मैं: … और जो भी किया, चुदाई की या नहीं?

जवाब में उसने चोली नीची करके आधे स्तन दिखाए। चोट लगी हो, वैसे धब्बे पड़े हुए थे। जीजू ने बेरहमी से स्तन मसल डाले थे।

मैं: कितनी बार चोदा जीजू ने?

दीदी मुझ से बड़ी थी फिर भी शरमाई और बोली: तुझे क्या? तूने क्या किया सारा दिन?

मैंने सारी बात बता दी। पारो को मैंने चोदा, यह जानकर वह इतनी खुश हुई कि मुझसे लिपट गई और गालों पर चूमने लगी।

मैंने पूछा- क्यूँ। वो पारो को अपनी चुदाई देखने ना कहती थी।

वो बोली: तेरे जीजू अपनी बहन से शरमाते हैं। कहते हैं कि वो देखेगी तो उनका वो खड़ा नहीं हो पाएगा।

मुझे इस उलझन का रास्ता निकालना था। सबसे पहले मैंने जाकर दीदी का बेडरूम देखा। कमरा बड़ा था। एक ओर पलंग था, दूसरी ओर चौड़ी सीट थी। पलंग के सामने वाली दीवार में एक बन्द दरवाड़ा था। दरवाड़े पर एक बड़ा आईना लगा हुआ था। आईने की वज़ह साफ थी। सीट के सामने बड़ी स्क्रीन वाली टीवी थी, वीडियो-प्लेयर और सीडी-प्लेयर के साथ। एक कोने में बाथरूम का दरवाज़ा था।

मैंने मकान की टूर लगाई बेडरूम की बगल में एक छोटी सी कोठरी पाई। कोठरी में फालतू सामान भरा था। एक दूसरा दरवाज़ा बन्द था जो मेरे ख़्याल से बेडरूम में खुलता था। मैंने चाकू निकाला और बन्द दरवाज़े की पैनल में एक सुराख़ बना दिया। दरवाज़ा पुराना होने से सुराख़ बनाने में देर ना लगी। मैंने झाँका तो दीदी का बेडरूम साफ़ दिखाई दिया। मेरा काम हो गया।

मैं अब जीजू के लौट कर आने की राह देखने लगा। इसी बीच मैंने वो किताब ठीक से पढ़ ली। काफ़ी जानकारी मिली। कच्ची कुँवारी को चोदने के लिए कैसे गरम किया जाय, वहाँ से लेकर तीन बच्चों की शादीशुदा माँ कैसे झड़वाया जाए, वो सब तस्वीरों के साथ उसमें लिखा था। रोज़ किताब पढ़कर मैं हस्तमैथुन करता रहा, क्यूँकि पारो मुझसे दूर रहती थी।

एक दिन पारो को एकांत पा कर किस करके मैंने कहा: चल कुछ दिखाऊँ। हाथ पकड़ कर मैं उसे कोठरी में ले गया और सुराख़ दिखाई। उसने आँख लगाकर देखा तो दंग रह गई।

मैंने कहा: जीजू आएँगे, उसी दिन दीदी को चोदेंगे। तू रात को यहाँ आ जाना, चुदाई देखने मिलेगी।

मैं दीदी से कहूँगा कि वो रोशनी बन्द ना करे।

मेरे गाल पर चिकोटी काट कर वो बोली: बड़ा शैतान है तू।

मैं उसे चूमने गया, तब ठेंगा दिखा कर वह भाग गई।

जीजू शुक्रवार को आए। दूसरे दिन शनिवार था। जीजू सिनेमा के अन्तिम शो की टिकटें ले आए। दीदी ने मुझे पारो के साथ बिठाने का प्रयत्न लेकिन वो नहीं मानी। मुझे जीजू के साथ बैठना पड़ा।

फिल्म बहुत सेक्सी थी। जीजू एक हाथ से दीदी की जाँघ सहलाते रहे। दीदी का हाथ जीजू का लंड टटोल रहा था। शो छूटने के बाद जब घर वापस आए, तब रात के बारह बजे थे।

सिनेमा देखने से मैं काफ़ी उत्तेजित हो गया था। मुझे ये भी पता था कि आज की रात जीजू दीदी को चोदे बिना नहीं छोड़ने वाले थे। मैं सोचने लगा कि वो कैसे चोदेंगे, और मुझसे रहा नहीं गया। मैंने किताब निकाली और एक अच्छी सी तस्वीर देखते हुए मैंने मुठ मार ली।

बाद में मैं दबे पाँव कोठरी में पहुँचा। सुराख़ में से देखा तो बेडरूम में रोशनी जल रही थी। जीजू नंगे बदन पलंग पर बैठे थे और लौड़ा सहला रहे थे। इतने में बाथरूम से दीदी निकली। उसने ब्रा और पैन्टी पहनी हुई थी। आकर वो सीधी जीजू की गोद में बैठ गी, उनकी ओर पीठ करके। जीजू ने आईने के ओर ईशारा करके कान में कुछ कहा। दीदी ने शरमा कर अपनी आँखों पर हाथ रख दिए जैसे ही दीदी के हाथ ऊपर उठे, जीजू ने ब्रा में क़ैद उसके स्तनों को थाम लिया। दीद उनके ऊपर ढल पड़ी और ऊँगलियों के बीच से आईने में अपना प्रतिबिम्ब देखने लगी।

जीजू ने हुक खोल कर ब्रा निकाल दी और दीदी के नंगे स्तनों को सहलाने लगे। दीदी के स्तन इतने बड़े होंगे ये मैंने सोचा ना था। जीजू की हथेलियों में समाते ना थे। स्तन के मध्य में बादामी रंग का गहरा घेरा और उसके बीचों-बीच घुण्डी थी। आईने में देखते हुए जीजू घुण्डियों को मसल रहे थे। दीदी ने सिर घुमा कर जीजू के मुँह से मूँह चिपका दिया। जीजू का एक हाथ दीदी के पेट पर उतर आया। दीदी ने ख़ुद की जाँघें उठाईं और चौड़ी कर दीं।

इतने में पारो आ गई। मैंने इशारे से कहा कि सुराख़ में देख। वो आगे आ गई और आँख लगाकर देखने लगी। मैं उसके पीछ सटकर खड़ा हो गया। मैंने मेरा सिर उसके कंधे पर रख दिया। धीरे से मैंने – दीदी की भोस दिख रही है? तेरे जैसी है ना? आकार में ज़रा बड़ी होगी। मेरे हाथ पारो की कमर पर थे। हौले-हौले मेरा हाथ पेट पर पहुँचा और वहाँ से स्तन पर।

पारो ने नाईटी पहनी थी। अन्दर ब्रा नहीं थी। बड़ी मौसम्बी के आकार के स्तन मेरी हथेलियों में समा गए। दबाने से दबे नहीं, ऐसे कड़े स्तन थे। नाईटी के आर-पार कड़ी घुण्डियाँ मेरी हथेलियों में चुभ रहीं थीं। वो दीदी की चुदाई देखती रही और मैं स्तन से खेलता रहा। थोड़ी देर बाद मैंने उसे हटाया और नज़र लगाई।

दीदी अब पलंग पर चित पड़ी थी। ऊपर उठाई हुई और चौड़ी की हुई उसकी जाँघों के बीच जीजू धक्का दे रहे थे। कुल्हे उछाल कर दीदी जवाब दे रही थी। आईने में देखने के लिए जीजू ने मुद्रा बदली। अब दीदी का सिर आईने की ओर हुआ। जीजू फिर से जाँघों के बीच गए और दीदी को चोदने लगे। इस बार चूत में आता-जाता उनका लंड साफ़ दिखाई दे रहा था। मैंने फिर पारो को देखने दिया।

मेरा लंड कब का तन गया था और पारो के कुल्हों के बीच दबा जा रहा था। पेट पर से मेरा हाथ उसके पाजामे के अन्दर घुसा। पारो नें मेरी कलाई पकड़ कर कहा: यहाँ नहीं, तेरे कमरे में जाकर करेंगे। मैंने हाथ निकाल लिया लेकिन पाजामे के ऊपर से भोस सहलाने लगा। पारो खेल देखती हुई नितम्ब हिलाने लगी। थोड़ी देर बाद सुराख़ से हटकर बोली: खेल खत्म, ओह रोहित, मुझे कुछ हो रहा है। मुझे से खड़ा नहीं जा रहा।

मैं पारो को वहीं की वहीं चोद सकता था। लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। मुझे अबकी बार पारो को आराम से चोदना था। थोड़ी देर पहले ही मैंने मूठ मार ली थी इसलिए मैं अपने आप पर नियंत्रण रख सका।

मैंने उसकी कमर पकड़ कर सहारा दिया। वो मुझ पर ढल पड़ी। मैंने उसे बाँहों में उठा लिया और मेरे कमरे में ले गया। पलंग पर बैठ मैंने उसे गोद में ले लिया।

मैंने कहा: देखी भैया-भाभी की चुदाई?

उसकी आँखें बन्द थीं। अपनी बाँहें मेरे गले में डालकर वो बोली: भैया का वो कितना बड़ा है! फिर भी पूरा भाभी की चूत में घुस जाता था ना?

मैंने कहा: तेरी चूत में भी ऐसे ही गया था मेरा लंड, याद है?

पारो: क्यों नहीं? इतना दर्द जो हुआ था।

मैं: अबकी बार दर्द नहीं होगा। चोदने देगी ना मुझे?

अपना चेहरा मेरी ओर घुमा कर वो बोली: शैतान, ये भी कोई पूछने की बात है?

पारो का कोमल चेहरा पकड़ कर मैंने होंठ से होंठ छू लिए, इसने चूमने दिया। मैंने अब होंठ से होंठ दबा दिए। उसके कोमल पतले होंठ बहुत मीठे लगते थे। थोड़ी देर कुछ किए बिना होंठ चिपकाए रखे। बाद में जीभ निकाल कर उसके होंठ चाटे और चूसे। मैंने कहा: ज़रा मुँह खोल।

डरते-डरते उसने मुँह खोला। मैंने उसके होंठ चाटे और जीभ उसके मुँह में डाली। तुरन्त उसने चूमना छोड़ दिया और बोली: छिः छिः ऐसा गन्द क्यूँ कर रहे हो?

मैं: इसे फ्रेंच किस कहते हैं। इसमें कुछ गन्द नहीं है। ज़रा सब्र कर और देख, मज़ा आएगा। खोल तो मुँह।

अबकी बार उसने मुँह खोला, तब मैंने जीभ लंड की तरह कड़ी कर ली और उसके मुँह में डाली। अपने होंठों से उसने पकड़ ली। अन्दर-बाहर करके जीभ से मैंने उसका मुँह चोदा। मुँह में जाकर मेरी जीभ चारों ओर घूम गई। तब मैंने मेरी जीभ वापस ली। फिर उसने ठीक इसी तरह अपनी जीभ से मेरा मुँह चोदा। मेरा लंड फिर तन गया, उसकी साँसें तेज़ चलने लगी।

चूमते हुए मेरे हाथ स्तन पर उतर आए। पाजामा तो हमने उतार दिया था। कमीज़ बाकी थी। देर किए बिना मैंने फटाफट हुकों को खोलकर कमीज़ उतार फेंकी। उसने मेरी कमीज़ के बटन खोल डाले। मैंने मेरी कमीज़ उतार दी। अब हम दोनों नंगे हो गए। शरम से उसने एक हाथ से चेहरा ढँक लिया, दूसरा चूत पर रख लिया। स्तन खुले हुए थे। मेरे हाथों ने नंगे स्तन थाम लिए।

क्या स्तन पाए थे उसने। बड़े आकार की मौसम्बी जैसे गोल-गोल। पारो के कुँवारे स्तन कड़े थे। मुलायम चिकनी त्वचा के नीचे खून की नीली नसें दिखाई दे रहीं थीं। बिल्कुल मध्य में एक इंच का गहरा घेरा था जिसके बीच छोटी सी कोमल घुण्डी थी। घेरा और घुण्डी बादामी रंग के थे और ज़रा सा उभर आए थे। उसका स्तन मेरी हथेली में ऐसे बैठ गया जैसे कि मेरे लिए ही बनाया हो।

स्तन को छूते ही दबोच लेने का दिल हुआ। लेकिन वो किताब की पढ़ाई याद आई। ऊँगलियों की नोक से पहले स्तनों को सहलाया। बाहरी भाग से शुरु करके स्तन के मध्य में लगी हुई घुण्डियों की ओर ऊँगलियाँ चलाईं। उसके बदन पर रोएँ खड़े हो गए। हौले से मैंने स्तन हथेली में भर लिया और दबाया। रुई के गोले जैसा नर्म होने पर भी उसके स्तन दबाए नहीं जा रहे थे, उत्तेजना से बहुत ही कड़े हो गए थे। छोटी सी घुण्डी सिर उठाए खड़ी थी। च्यूँटी में लेकर मैंने दोनों घुण्डियों को मसल दिया। पारों के मुँह से लम्बी आह निकल पड़ी।

मैंने उसे लिटा दिया। मैं बगल में लेट गया। वो मुझसे लिपट गई। मैंने मेरे होंठ घुण्डी से चिपका दिए। उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में घूमने लगीं। एक-एक कर मैंने दोनों घुण्डियाँ काफी देर तक चूसीं। पारे ने मेरी घुण्डियाँ तलाश निकाली। जब मैंने उसकी घुण्डियाँ छोड़ दीं, तब उसने मेरी घुण्डियों को होंठों के बीच लेकर चूसीं। घुण्डियों से निकला करंट लंड तक पहुँच गया। लंड अधिक अकड़ कर लार बहाने लगा।

मैंने उसे चित्त लिटा दिया। हमारे मुँह फिर फ्रेंच किस में जुट गए। स्तन छोड़ करक मेरा हाथ उसके सपाट पेट पर उतर आया और भोस की ओर चला। जब मैंने नाभि को छुआ, उसे गुदगुदी हुई, वो छटपटाई और उस के पाँव ऊपर उठ गए।

मैंने उस किताब में पढ़ा था कि नई-नवेली दुल्हन किशोरी को लंड से दूर रखना चाहिए, ताकि उत्तेजित होने से पहले वह लंड देखकर घबरा न जाए। पारो तीन बार मेरा लंड पकड़ चुकी थी और अब उत्तेजित भी हो गई थी। इसलिए मैं रुका नहीं। उसका दाहिना हाथ पकड़ कर मैंने लंड पर रख दिया।

वो डरी नहीं, लंड पकड़ लिया। लेकिन आगे क्या करना, उसे पता नहीं था। वो लंड को पकड़े रही, कुछ भी किए बिना। फिर भी उसकी कोमल ऊँगलियों का स्पर्श मुझे बहुत मीठा लगता था। लंड अधिक कड़ा हो गया, ठुमके लगाने लगा और भरपूर लार बहाने लगा। मैंने उसकी कलाई पकड़ कर दिखाया कि मूठ कैसे मारी जाती है। धीरे-धीरे वो मूठ मारने लगी।

मुट्ठी से लंड दबोच कर वो बोली: कितना बड़ा और मोटा है तेरा ये? लोहे जैसा कठोर भी है, तुझे दर्द नहीं होता?

मैं: कड़ा ना हो, तो चूत में कैसे घुस पाएगा? मोटा और बड़ा है तेरी चूत के लिए।

पारो: मुझे तो पकड़ने से ही झुरझुरी हो जाती है।

उधर मेरा हाथ भोस पर पहुँच गया था। मेरी ऊँगलियाँ भोस की दरार में उतर पड़ीं। भोस ने भी भरपूर रस बहाया था और चारों ओर गीली-गीली हो गई थी। हल्के स्पर्श से मैंने भोस सहलाई। पारो ने पाँव उठा रखे थे, अब उसने जाँघें सिकोड़ दीं। फिर भी मेरी एक ऊँगली उसकी चूत के भग्न तक जा पाने में सफल रही। जैसे ही मैंने उसके भग्न को छुआ, पारो ने मेरा हाथ पकड़ कर हटा दिया।

अब चूमना छोड़ कर मैं बैठ गया और बोला: पारु, देखने दे तेरी भोस।

अपने हाथ से भोस ढँकने का प्रयत्न करते हुए वह बोली: ना, रहने दो, मुझे शर्म आती है।

मैं: मेरा लंड लेने में शर्म ना आई? अब शर्म कैसी? शरम आए तो मेरा लंड पकड़ लेना। चल, पाँव खुले कर।

वो ना-नुकर करती रही और मैं उसे पलंग के किनारे पर ले आया। मैं ज़मीन पर बैठ गया। जाँघें उठाकर चौड़ी की। शरमाते हुए भी उसने अपने पाँव चौड़े कर लिए। किताब में जैसी दिखाई थी वैसी ही उसकी भोस मेरे सामने आई।

मैंने पारो को दो बार चोदा था लेकिन उसकी भोस ठीक से देखी नहीं थी। इस वक़्त पहली बार ग़ौर से देखने का मौक़ा मिला था मुझे। उसकी भोस काफी ऊँची थी। बड़े होंठ मोटे थे और एक दूजे से सटे हुए थे। भोंस पर और बड़े होंठ के बाहरी हिस्से पर काले घुँघराले झाँटें थीं। बड़े होंठ के बीच तीन इंच लम्बी दरार रथी। मैंने हौले से बड़े होंठ चौड़े किए। अन्दर का कोमल हिस्सा दिखाई दिया। साँवली गुलाबी रंग के छोटे होंठ सूज गए मालूम होते थे। छोटे होंठ आगे जहाँ मिलते थे वहाँ उसकी भग्न थी। इस वक्त वही कड़ी हो गई थी, वह एक इंच लम्बी थी। उसका छोटा मत्था चेरी जैसा दिखता था। दरार के पिछले भाग में था योनि का मुख, जो अभी बन्द था। सारी भोस काम-रस से गीली-गीली हो चुकी थी।

मुझे फिर से किताब की शिक्षा याद आई, कैसे भोस चाटी जाती है। पहले मैंने बड़े होंठ के बाहरी भाग पर जीभ चलाई। आगे से पीछे और पीछे से आगे, दोनों ओर चाटी। पारो के नितम्ब हिलने लगे। होंठ चौड़े कर के मैंने जीभ की नोक से अन्दरी हिस्सा चाटा और भग्न टटोली। भग्न को मैंने मेरे होंठों के बीच लिया और चूसा।

पारो से सहा नहीं गया। मेरा सिर पकड़कर उसने हटा दिया और मुझे खींच कर अपने ऊपर ले लिया। उसने अपनी जाँघें मेरी कमर में डाल दीं तो भोस मेरे लंड के साथ जुट गईं। वह धीरे से बोली: चल ना, कितनी देर लगाता है?

राह देखने की क्या ज़रूरत थी? हाथ में पकड़ कर लंड का मत्था मैंने भोस की दरार में रगड़ा, ख़ास तौर पर भग्न पर। इस वक़्त मुझे पता था कि चूत कहाँ है। इसलिए लंड को ठीक निशाने पर लगाने में दिक्क़त नहीं हुई। लंड का मत्था चूत के मुँह में फँसा कर मैं पारो पर लेट गया।

मैंने कहा: पारो, दर्द हो तो बता देना।

हल्के दबाव से मैंने लंड चूत में डाला। सर्रर्रर्रर्रर्ररररररररर करता हुआ लंड जब आधा अन्दर गया तब मैं रुका। मैंने पारो से पूछा: दर्द हो रहा है क्या?

जवाब में उसने अपनी बाँहें गले में डालीं और सिर हिला कर ना कहा। अब मैं आगें बढ़ा और हौले-हौले पूरा लंड चूत में पेल दिया। उसकी सिकुड़ी चूत की दीवारें लंड से चिपक गईं।

ऊपरवाले ने भी क्या जोड़ी बनाई लंड-चूत की? अभी तो चूत में डाला ही था, चोदना शुरु किया नहीं था। फिर भी सारे लंड में से आनन्द का रस झड़ने लगा था। लंड से निकली हुी झुरझुरी सारे बदन में फैल जाती थी। थोड़ी देर लंड को चूत की गहराई में दबा रख मैं रुका और चूत का मज़ा लिया। मैंने उससे पूछा: पारो, मज़ा आ रहा है ना?

इतना कहकर मैंने लंड खींचा। तुरन्त उसने मेरे कूल्हे पर पाँव से दबाव डाला और चूत सिकोड़ कर लंड निचोड़ा। मैंने फिर कहा: अब तू मुँह से कहेगी, तभी चोदूँगा, वर्ना उतर जाऊँगा… क्या करना है?

वो बोली: क्यूँ सताते हो? मैं बोल नहीं सकती।

मैं: पाँव पसारे लंड ले सकती हो, और बोल नहीं सकती? एक बार बोल, मुझे चोदो।

हिचकिचाती हुई वो बोली: म…मुझे च… चो… दो।

फिर क्या कहना था? आधा लंड बाहर निकाल कर मैंने फिर से घुसा दिया। धीरे और लम्बे धक्के से मैं पारो को चोदने लगा। सर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रररररररर बाहर, सर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रररर अन्दर। वो भी नितम्ब हिला-हिला कर इस तरह चुदवाती थी कि लंड का मत्था अलग-अलग से घिस पाए। किताब में मैंने भग्न के बारे में पढ़ा था। मैं भी इस तरह धक्के देता था जिससे भग्न में रगड़ पड़ सके।

तीन दिन के बाद ये पहली चुदाई थी पारो के लिए। हम दोनों जल्दी उत्तेजित हो गए। लंड चूत में आते-जाते ठुमक-ठुमक करने लगा। योनि में स्पंदन होने लगी। पारो ज़ोरों से मुझसे लिपट गई। मेरे धक्के तेज़ और अनियमित हो गए। मैं घचा-घच्च, घचा-घच्च चोदने लगा। एकाएक पारो का बदन अकड़ गया और वो चिल्ला उठी। मेरी पीठ पर उसने नाख़ून गाड़ दिए। ज़ोर-ज़ोर से चारों ओर नितम्ब घुमा कर झटके देने लगी। चूत में फटाके होने लगी। अपने स्तन मेरे सीने से रगड़ दिए। स्खलन तीस सेकेण्ड तक चला।

स्खलन के बाद भी वह मुझे हाथ-पाँव से जकड़ी रही। मैं झड़ने के क़रीब था इसलिए रुका नहीं। धना-धन, धना-धन धक्के लगाता रहा। लंड कठोर था और चूत गीली थी इसलिए ऐसी घमासान चुदाई हो सकी। ज़ोरों के पाँच-सात धक्के मार मैंने पिचकारी छोड़ दी। मेरे वीर्य से उसकी योनि छलक उठी।

कुछ देर तक हम होश खो बैठे। जब होश आया तो पता चला कि पारो चिल्लाई थी और हो सकता था कि दीदी और जीजू ने चीख सुन भी ली हो। घबरा कर मैं झटपट उतरा और बोला: पारो, जल्दी कर। चली जा यहाँ से। दीदी-जीजू आएँगे तो मुसीबत खड़ी हो जाएगी।

पारो का उत्तर सुनकर मैं हैरान रह गया, वो बोली: आने भी दे, तू डर मत। मैं ख़ुद भैया से कहूँगी कि तेरा कसूर नहीं है, मैं ही अपने-आप चु… चु… वो करवाने चली आई हूँ। अब लेट जा मेरे साथ।

हम दोनों एक-दूसरे से लिपट कर सो गए। दीदी या जीजू कोई भी नहीं आए।

सुबह पाँच बजे वो जागी और अपने कमरे में जाने को तैयार हुई। मुँह पर चूमकर मुझे जगाया और बोली: मैं चलती हूँ, सुबह के पाँच बजे हैं। तुम सोते रहो, और आराम करो। रात फिर मिलेंगे।

लेकिन मैं उसके कहाँ जाने देने वाला था! खींच कर आगोश में ले लिया। वो ना-ना करती रही। मैं जगह-जगह पर चूमता रहा। आख़िर उसने पाजामा उतारा और जाँघें फैलाईं। मेरा लंड तैयार ही था। एक झटके में चूत की गहराई नापने लगा। इस वक्त सावधानी की कोई ज़रूरत नहीं थी। धना-धन तेज़ी से चुदाई हो गई तीन मिनट तक। दोनों साथ-साथ झरे।

दूसरे दिन मैंन दीदी से पूछा: आईने में देखते हुए चुदाई का मज़ा कैसा होता है?

वो बोली: शैतान, तुझे कैसे पता चला कि हम… कि हम…?

मैं उसे कोठरी में ले गया और सुराख़ दिखाई। वो समझ गई।

शालिनी: तो तूने आख़िर हमारी चुदाई देख ही ली।

मैं: मैंने नहीं, हमने कहो।

शालिनी: ओह, तो पारो भी साथ थी?

मैं: हाँ थी।

शालिनी: तब तो तूने उसे… उसे…?

मैं: हाँ, मैंने उसे चोदा जी भर के।

शालिनी: चूत भर के कहो। कैसी लगी उसकी कुँवारी चूत?

मैं: बहुत प्यारी। मेरा लंड भी कुँवारा ही था ना!

शालिनी: अब क्या? शादी करेगा उससे?

दोस्तों, आ गए हम हमारी समस्या पर। मैं दीदी के घर अधिक दिनों तक नहीं रुका, लेकिन जितने दिन भी रहा, इतने दिन रोज़ाना रात को पारो को चोदा। किताब में दिखाए गए आसनों में से कोई-कोई आज़मा कर भी देखे। किताब के मुताबिक़ उसे लंड चूसना भी सिखाया। अकेले मुँह को भग्न से लगाकर उसे झड़वाया। छुट्टियाँ खत्म होने से पहले मैं घर लौट आया।

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