छुपाए नहीं छुपते-2

प्रेषक : कुमार बोसोन

उसने मेरा लिंग अपने हाथों में पकड़ लिया और बोली- आपका लिंग तो बहुत बड़ा है।

मैं चौंक गया, मैंने पूछा, “तुम्हें कैसे पता? तुमने तो आजतक सिर्फ़ मेरा ही लिंग देखा है।

उसने फिर अपनी आँखें बंद कर लीं और शर्म से उसके गाल लाल हो गए।

मैंने कहा- बता सुगंधा की बच्ची, तुझे कैसे पता कि मेरा लिंग बहुत बड़ा है?

वो बोली- छात्रावास में कंप्यूटर विज्ञान की एक लड़की के पास कंप्यूटर है। छात्रावास में हमारी सीनियर्स ने रैगिंग के दौरान हमें उस कंप्यूटर पर ब्लू फिल्म दिखाई थी। उसके बाद मैंने कई बार अपनी सहेलियों के साथ उस कंप्यूटर पर ब्लू फ़िल्म देखी है लेकिन जितना बड़ा आपका लिंग है इतना बड़ा उन फिल्मों में किसी का भी लिंग नहीं था।

मैंने कहा- मैं इतना बड़ा हो गया हूँ और आज तक मैंने सिर्फ़ मस्तराम की कहानियाँ ही पढ़ी थीं और तूने फिल्में भी देख लीं। विज्ञान संकाय की लड़कियाँ छात्रावास में रहकर वाकई बर्बाद हो जाती हैं। लेकिन उन फ़िल्मों में तो लिंग चूसते हुए भी दिखाते होंगे। तो तू मेरा लिंग क्यों नहीं चूस रही है?

वो बोली- मुझे वो दृश्य बहुत गंदे लगते हैं। जब ऐसे दृश्य फ़िल्मों में आते हैं तो मैं अपना मुँह दूसरी तरफ घुमा लेती हूँ।

‘यह लड़की नहीं चूसने वाली, लेकिन एक दिन मैंने अपना ये भीमकाय लिंग इसके गले तक न उतारा तो मेरा भी नाम नहीं।’

यह सोच फिर मैं नीचे आया और उसके जींस का एकमात्र बटन खोलकर जिप नीचे सरकाई। उसने काले रंग की पैंटी पहनी हुई थी। जींस इतनी मस्त और पैंटी गाँव की लड़कियों वाली।

बहरहाल मैंने उसका जींस पकड़कर नीचे खींचना शुरू किया। जींस बेहद टाइट थी। नीचे खींचने में मुझे पसीना आ गया। लड़कियाँ इतनी टाइट जींस पहनती ही क्यूँ हैं?

मैंने सुगंधा से कहा- जल्दी से अपनी जींस उतार।

वो उठी और उसने एक ही झटके में अपनी जींस उतार कर रख दी। इसे कोई जादू आता है क्या? जिस काम में मुझे इतनी दिक्कत हो रही थी इसने एक झटके में कर दिया।

अब बात मेरे बर्दाश्त के बाहर थी। मैंने उसकी पैंटी पकड़कर खींची तो वो चर्र की आवाज़ के साथ फट गई। गाँव की लड़कियों की पतली सी पैंटी।

उसने कहा- मेरी पैंटी फाड़ दी आपने, अब मैं क्या पहनूँगी?

मैं बोला- चुप रह, मैं दस खरीद दूँगा। चार रूपए की पैंटी के लिए चार करोड़ के आनन्द में विघ्न डाल रही है।

सुगंधा समझ गई कि अब मै खुद पर से नियंत्रण खो चुका हूँ। वो और कुछ बोलती इससे पहले ही मैंने उसकी योनि को मुँह में भरकर चूसना और बीच बीच में दाँतों से हल्के से काटना शुरू कर दिया। उसकी कमर मचलने लगी।

मैं पागलों की तरह उसकी योनि चूस रहा था। आज मुझको योनि की गंध दुनिया के बेहतरीन इत्र से भी अच्छी लग रही थी और योनि का हल्का नमकीन, हल्का कसैला और हल्का खट्टा स्वाद दुनिया के सबसे स्वादिष्ट पकवान से भी लजीज लग रहा था। मैंने अपनी जीभ उसकी योनि के अंदर जितना घुस सकती थी घुसेड़ दी। उसने अपनी कमर ऊपर उठा दी ताकि मैं अपनी जीभ और अंदर घुसेड़ सकूँ। मैं अपनी जीभ उसकी योनि में तेजी से अंदर बाहर करने लगा। उसकी कमर हिलने लगी। मैंने जीभ बाहर निकाली और फिर से उसकी योनि मुँह में लेकर चूसने लगा।उसकी योनि में स्थित मटर के फूल के बीच में एक मटर के दाने जैसी छोटी संरचना थी। जैसे ही मेरी जीभ उससे टकराती उसके मुँह से सिसकारी निकलने लगती। मैं समझ गया कि इस मटर के दाने को चुसवाने में इसे ज्यादा मजा आ रहा है। मैंने अपना सारा प्रयास उस मटर के दाने को अपनी जीभ से चाटने में लगा दिया। जितना तेजी से मुझसे हो सकता था मैं उस दाने को चूस रहा था। सुगंधा के मुँह से निकली सिसकारियाँ कमरे में गूँज रही थीं।

थोड़ी देर बाद उसने कसकर मेरे बाल अपनी हथेलियों में पकड़ लिए, धीरे धीरे उसके हाथों ने मेरे बालों को खींचना शुरू किया। मैं तेजी से चूस रहा था और उसकी हथेलियों का खिंचाव मेरे बालों पर बढ़ता जा रहा था।

अचानक उसकी कमर बुरी तरह उछलने लगी और वो मुझे दूर धकेलने लगी लेकिन मैंने चूसना नहीं छोड़ा।

कुछ क्षणों बाद उसने कहा- बस, भैया बस ! अब बस करो, प्लीज।

और वो निढाल पड़ गई।

सुगंधा को चरम आनंद की प्राप्ति हो चुकी थी, अब मेरी बारी थी। मैं बिना देरी किए उसके ऊपर आ गया। उसकी योनि चूसने से काफी गीली हो चुकी थी। मैंने लिंग मुंड को तीन-चार बार उसकी योनि से रगड़कर गीला किया और बेताबी में एक जोर का धक्का दिया। मेरा लिंगमुंड सुगंधा की योनि में प्रविष्ट हुआ और उसके मुँह से घुटी घुटी सी चीख निकली। उसने मुझे अपने ऊपर से धकेलने की कोशिश की लेकिन मुझे धकेलना उसके बस की बात कहाँ थी। वो दो तीन बार तड़पी फिर ढीली पड़ गई।

मैं उसके होंठों को अपने होंठों में लेकर चूसने लगा। कुछ क्षणों बाद मैंने फिर एक धक्का मारा तो उसने अपने होंठ मेरे होंठों से छुड़ा लिए और बोली- आज फिर दर्द हो रहा है।

मैंने पूछा- पिछली बार से कम या पिछली बार से ज्यादा?

वो बोली- नहीं, पिछली बार तो बहुत ज्यादा दर्द हुआ था।

मैंने कहा- तो सब्र कर, जैसे पिछली बार किया था थोड़ी देर में दर्द गायब हो जाएगा।

इस बार मैंने आहिस्ता आहिस्ता अपने लिंग पर दबाव बढ़ाया। लिंगमुंड उसकी गहराइयों में उतरने लगा। उसे थोड़ी दिक्कत तो हो रही थी लेकिन आनन्द पाने के लिए कष्ट तो सहना ही पड़ता है। लिंग पूरा उसकी गहराई में उतर जाने के बाद मैंने आहिस्ता आहिस्ता अपनी कमर हिलानी शुरू की। वो मेरा साथ नहीं दे रही थी पर इस वक्त मुझे परवाह कहाँ थी। मैं धीरे धीरे अपनी गति बढ़ाने लगा। उसकी जाँघों से मेरी जाँघें टकराने लगीं और कमरे में धप धप की आवाज गूँजने लगी। उसके होंठ मेरे होंठों में थे और उसके मांसल उरोज मेरी छाती से दबकर चिपक गए थे।

मैं और जोर से धक्के मारने लगा। थोड़ी देर बाद वो भी मेरे धक्कों के साथ साथ कमर हिलाने लगी। मैंने उसकी दोनों टाँगें अपने नितंबों के ऊपर चढ़ा लीं और अपने हाथ उसके नितंबों के नीचे ले गया। अब मैं और गहराई में पहुँच रहा था। अब वो अपनी जीभ से मेरी जीभ चूस रही थी। संभोग का नशा उसके भी सर चढ़कर बोल रहा था।

एक बार फिर हम दोनों अपने होश खो बैठे थे।

मेरे मुँह से फिर गंदे शब्द निकल रहे थे- सुगंधा, जानेमन, कैसा लग रहा है मेरी जान? मजा आ रहा है रानी? देख तेरी छोटी सी चूत का मेरे मोटे लंड ने क्या हाल कर दिया है। मैंने तेरी फाड़ डाली है सुगंधा। अब मैं जब चाहूँगा, जहाँ चाहूँगा, जैसे चाहूँगा तुझे चोदूँगा मेरी जान। ओ सुगंधा मेरी जानेमन। ये ले मेरी जान। ले ले मेरा मोटा लौंडा। आज मैं अपने बीज से तेरी सारी आग बुझा दूँगा मेरी जान।

सुगंधा के मुँह से भी गंदे गंदे शब्द निकल रहे थे। फच फच की आवाज के साथ गंदे शब्द मिलकर अजीब सा संगीत रच रहे थे।

अचानक सुगंधा मुझसे कसकर लिपट गई। उसका बदन काँपने लगा। मैं समझ गया कि यह दोबारा चरम आनंद प्राप्त कर रही है। मैं अपनी पूरी ताकत से धक्के मारने लगा। मैं अपना सारा वीर्य उसकी योनि में गिराना चाहता था।

अचानक वो बोली- आज अंदर मत गिराइएगा।

मैंने पूछा- क्यों?

वो बोली- पिछली बार सुरक्षित समय था। इस बार अंदर गिराएँगें तो मैं गर्भवती हो जाऊँगी। मेरा मासिक धर्म हुए दस दिन बीत चुके हैं।

मेरे दिमाग को एक झटका सा लगा। यह जीव विज्ञान की छात्रा है निश्चित ही सही कह रही होगी। इतना बड़ा रिस्क लेना ठीक नहीं है। जीव विज्ञान में मेरा सामान्य ज्ञान वाकई कमजोर था।

मैंने अपना लिंग बाहर निकाल लिया। उसकी टाँगों को पूरी तरह फैला दिया और उनके बीच में बैठकर हस्तमैथुन करने लगा। उसकी योनि के बाल न ज्यादा छोटे थे न ज्यादा बड़े। मैं एक हाथ से उसकी योनि सहलाने लगा और एक हाथ से हस्तमैथुन करने लगा। दो मिनट बाद मेरे लिंग से वीर्य की धार निकलर उसके पेट और स्तनों पर गिरने लगी। कुछ बूँदें उसके चेहरे पर भी गिरीं। उसने अजीब सा मुँह बनाया।

मैंने उसकी फटी पैंटी उठाई और उसके शरीर से अपना वीर्य पोंछकर साफ किया। फिर मैंने उसे कसकर अपनी बाहों में जकड़ लिया।

मेरा मुँह खिड़की की तरफ था, अचानक मैंने देखा कि पर्दे के एक किनारे किसी की छाया पड़ रही है। पर्दे और खिड़की की दीवार के बीच थोड़ी सी जगह थी और बाहर जो कोई भी था वो यकीनन यह सब देख रहा था।

मेरे तो होश उड़ गए, अब क्या होगा? कौन हो सकता है बाहर?

आज रविवार है और हो सकता है कि नेहा मुझसे हिंदी पढ़ने आई हो !

हे कामदेव, वासना मिटाने के चक्कर में इतनी महत्वपूर्ण बात मेरे ध्यान से कैसे उतर गई।

मैं फटाफट उठा और जल्दी से कुर्ता और पैजामा डालकर बाहर आया। नेहा जल्दी जल्दी सीढ़ियाँ उतर रही थी। संभवतः उसने भी मुझे अपनी ओर देखते देख लिया होगा।

हे कामदेव, अगर इसने किसी से कुछ कह दिया तो मैं और सुगंधा कहीं के नहीं रहेंगे।

मेरे मुँह से अपने आप निकल गया- नेहा, सुनो !

वो खड़ी हो गई, उसने मुड़कर देखा, उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया था।

मैंने कहा- आओ, तुम्हें अपनी चचेरी बहन से मिलवाता हूँ।

वो वहीं खड़ी रही। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा, मैं सभी देवताओं से मनाने लगा कि आज बचा लो, आज के बाद ऐसा काम कभी नहीं करूँगा।

फिर उसने ऊपर वाली सीढ़ी पर कदम रखा। मैंने चैन की साँस ली, कामदेव एवं अन्य देवों को धन्यवाद दिया।

वो ऊपर आई। हम कमरे में आए। सुगंधा बाथरूम में थी। उसकी पैंटी एक कोने में पड़ी हुई थी। मेरे अंडरवीयर और बनियान बेड के नीचे पड़े हुए थे।

सुगंधा बाहर निकली। उसने कपड़े पहन लिए थे अपने बाल जूड़े की शक्ल में बाँध लिए थे।

मैंने दोनों का परिचय करवाया। उसके बाद मैंने नेहा को मिठाई दी।

फिर नेहा के हाथ से किताब लेकर मैंने उसे “कामायनी” का वो अंश जो उसकी पुस्तक में थे दिखाया और बोला- इसे अच्छी तरह पढ़ लो। अगर इसकी भाषा तुम्हें कठिन लगे तो चिंचित मत होना। तुम इसे दो तीन बार गा गाकर पढ़ लो। मैं जरा सुगंधा को इसके छात्रावास छोड़ कर आता हूँ। मैं वापस आकर तुम्हें इस महाकाव्य के बारे में विस्तार से बताऊँगा।”

सुगंधा को साथ लेकर मैं निकल पड़ा।

रास्ते में उसने मुझसे पूछा- आप को एकदम सही समय पर कैसे ख्याल आया कि यह ऊपर आने वाली है?

अब मैं सुगंधा को कैसे बताता कि नेहा ने सबकुछ देख लिया है। सुगंधा बेकार में डर जाती। मैंने बाजार से उसके लिए नई पैंटीज लीं और उसे उसके छात्रावास छोड़ कर वापस लौटा।

रास्ते में मुझे वो प्रसिद्ध कहावत याद आई। इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपते। अब क्या होगा? क्या नेहा सबको बता देगी कि मैं और सुगंधा संभोग कर रहे थे?

कहीं नेहा मुझे ब्लैकमेल तो नहीं करने लगेगी?

हे कामदेव, इस बार बचा ले।

आगे क्या हुआ? जानने के लिए इंतजार कीजिए कहानी के अगले भाग का !

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