प्रोफेसर प्यारेलाल का प्यार

(Professor Pyare Lal Ka Pyar)

वरिन्द्र सिंह 2019-03-26 Comments

दोस्तो, मैं आपकी अपनी अर्चना मैडम। उम्र 40, कद पाँच फीट 3 इंच, रंग गोरा, सीना 40 कमर 38 और हिप 42.
मुझे पता है इतना पढ़ते ही आप लोगों ने तो मुझे अपने तसव्वुर में नंगी कर ही लिया होगा।
मगर एक और बात बता दूँ; मेरे जो निप्पल हैं, वो हल्के भूरे हैं. बेशक मैं तीन बच्चों की माँ हूँ और तीनों बच्चों ने मेरा दूध 2 ढाई साल तक पिया है, मगर इतना चूसने के बाद भी मेरे निप्पल की डोडी बाहर को उभरी हुई नहीं है, निप्पल बस छोटे से दाने जैसे हैं, जैसे किसी ने खरबूजे पर आधा अंगूर काट कर रख दिया हो, समझ गए न।

और वैसे जब दो साल की प्यासी शादीशुदा औरत किसी गैर मर्द से अपनी प्यास बुझा ले, तो फिर तो न जाने क्यों ये प्यास बढ़ती ही जाती है। फिर तो ऐसे लगने लगता है कि हर पुरुष में सिर्फ उसकी मर्दानगी ही दिखती है चाहे रिश्ता कोई भी हो।
मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ जब मुझे मेरे पड़ोसी के बेटे ने पहली बार चोदा और मेरी बरसों की प्यास बुझाई; तो मैं तो उस पर दीवानी हो गई. उसके बाद तो वो हर शनिवार आता और मुझे डेढ़ दो घंटे तक लगतार और शानदार तरीके से चोद कर जाता।
उसके साथ ही मैंने अपनी जिस्म की बरसों की प्यास बुझाई। उसने जैसे कहा, मैंने वैसा किया। पहले मैंने कभी गांड नहीं मरवाई थी, मगर उसने कहा तो मैंने उस से अपनी गांड भी मरवा ली और उसके बाद वो अक्सर मेरी गांड मारता।

लंड तो मैं चूसती ही थी, उसने एक दो बार मुझे अपना माल भी पिलाया, हालांकि मुझे वीर्य पीना पसंद नहीं है मगर फिर भी मैंने सिर्फ उसकी खुशी के लिए पी लिया।
यक्क …
चलो कोई बात नहीं, वो भी तो जब मेरी फुद्दी चाटता था तो मेरा पानी जो छूटता था, सब चाट जाता था।

उसके बाद मैं प्रेग्नेंट हुई। मुझे नहीं पता कि मेरे पेट में जो बच्चा था, वो मेरे पति का था, या उस लड़के का। खैर मेरी पहली बेटी हुई मगर फिर मेरा उस लड़के से अफेयर चलता रहा।
छिले(प्रसव) के 2 महीने बाद हम फिर मिले। अपने पति से पहले मैं उससे मिली, अपने यार से; उसने खूब चोदा मुझे, दर्द भी हुआ, क्योंकि अभी मेरा बदन इस सब के लिए तैयार नहीं था। मगर फिर भी मैंने उसे इंकार नहीं किया।

मेरे दूध से भर मम्मों से वो बहुत खेला, खूब दूध निचोड़ा मेरा। अपने दूध से मैंने उसका लंड धोया। उसने खुद भी मेरा बहुत दूध पिया।
उसके बाद तो गाड़ी चल सो चल … जब तक मेरी बेटी मेरा दूध पीती रही, वो भी मेरा दूध हर बार पीता, मज़े के लिए या वैसे ही, पर बिना मेरे मम्मों से दूध चूसे, उसने मुझे कभी नहीं चोदा।
चलो जब बेटी थोड़ी बड़ी हो गई तो उसने मेरा दूध पीना छोड़ दिया और फिर कुछ समय बाद मेरे दूध आना भी बंद हो गया। इसी दौरान उस लड़के को जॉब मिल गई और वो अमेरिका चला गया, जहां जाकर उसने शादी भी कर ली। मैं फिर से अपने पति तक सीमित रह गई।

मगर मैं अब कहाँ टिकने वाली थी। शेरनी के मुंह को खून लग चुका था तो मैंने अब कोई और तलाश करना शुरू कर दिया। इसी दौरान मुझे एक हमारे कॉलेज के प्रोफेसर मिले। बेशक उनका नाम तो कुछ और है, मगर मैंने वैसे ही इस कहानी में उनका नाम प्यारेलाल रखा है क्योंकि वो मुझे प्यार बहुत करते हैं. पर प्यार के दौरान मार मार कर लाल कर देते हैं इसलिए प्यारे और लाल मिल कर बने प्यारेलाल।

वो तलाक़शुदा थे दो बार। वैसे ही एक बार उनसे बात हो रही थी, वो तो अपनी व्यथा सुना रहे थे मगर मैंने उनकी बातों में एक बढ़िया मर्द ढूंढ लिया। उनके दोनों तलाक इसी वजह से हुये थे कि सेक्स के दौरान वो बहुत ही हिंसक हो जाते थे।
मैंने सोचा- यार मार पीट गाली गलौच का भी सेक्स में अपना मज़ा है, क्यों न इसके साथ भी ट्राई करके देखा जाए।
मैंने भी बातों बातों में अपना दुखड़ा रो दिया कि मेरे पति तो मुझे आज तक संतुष्ट नहीं कर पाये।

इतना पता लगना चाहिए मर्दों को कि फलां औरत का पति उसे खुश नहीं कर पाता है, साले एक मिनट नहीं लगाते, अपने आप को बेस्ट केंडीडेट साबित करने में।
तो हमारे प्रोफेसर साहिब ने भी ऑफर रख दी मेरे सामने- देखिये मैडम, हम दोनों एक ही कश्ती के सवार हैं, मुझे और आपको दोनों को एक ही चीज़ चाहिए, मगर हम दोनों के पास एक दूसरे को देने वाली चीज़ तो है, मगर अभी तक हम इसे सिर्फ अपने पास ही संभाल कर रखे हैं। अगर आप चाहें तो हम आपस में ये बाँट कर एक दूसरे को संतुष्ट कर सकते हैं, बाकी आपकी मर्ज़ी।
अब मर्ज़ी तो मेरी थी तो बिना कोई देरी किए मैंने कहा- तो ऐसा करते हैं एक ट्राई करके देखते हैं, बात बनी तो ठीक, नहीं तो नहीं मगर इस से आगे और कुछ नहीं होगा। हम फिर भी ऐसे ही दोस्त रहेंगे।
वो खुश हो गए, और हाथ मिला कर हमने डील फाइनल कर ली।

अगले हफ्ते हमने शनिवार को उसके ही घर मिलने का प्लान बनाया। मैं सुबह तैयार होकर कॉलेज के लिए निकल पड़ी। बच्ची तब तक स्कूल जाने लगी थी और वापिस आने पर उसे घर की मेड संभाल लेती थी।

मैं पूरी तरह से सज धज कर उसके घर पहुंची। वो एक फ्लैट में रहते थे। घर के अंदर घुसते ही उन्होंने मुझे अपनी आगोश में लिया और मेरे होंटों पर एक गर्मजोशी भरा चुंबन लेकर मेरा अपने घर में स्वागत किया। मैंने भी उसके इस चुंबन का बुरा नहीं माना, अब जब फुद्दी मरवाने आई हूँ, तो चुंबन का बुरा क्यों मनाया जाए।

अंदर हाल में उन्होंने खाने पीने का सब इंतजाम कर रखा था। टेबल पर पहले ही दो गिलास, शराब, सोडा, पानी, सिगरेट, नॉन वेज, नमकीन, सब बड़े करीने से सजा कर रखा था। मुझे उन्होंने बैठने का ऑफर किया- स्वागत है आपका मेरे गरीबखाने में, आइये विराजिए।
मैं मुस्कुरा कर सोफ़े पर बैठ गई; पर्स साइड पर रखा, चश्मा उठा कर सर पर कर लिया।

उन्होंने मेरे बदन को घूर कर देखा, जैसे कुछ सोच कर मन ही मन खुश हो रहा हो। फिर बोला- क्या लेंगी आप?
मैंने कहा- देखिये, मैं तो एक बहुत ही रूढ़िवादी परिवार से हूँ। आप जो कुछ ये सजा कर बैठे हैं, हमारे घर में तो इन चीजों का नाम भी नहीं लिया जाता।
वो हंस कर बोला- क्या शादी के बाद गैर मर्द से संबंध को आपके परिवार में मान्यता है?
मैंने थोड़ा हैरान होकर कहा- नहीं, क्यों?
वो बोला- जब आप वो काम भी अपनी परिवार की मर्ज़ी के खिलाफ करने आई है, तो इस सब में क्या बुराई है, आज सब कुछ पहली बार हो जाने दो।

मैंने सोचा, अब जब अपने चरित्र से गिर ही रही हूँ, तो क्या दिक्कत है, इतनी दुनिया खाती पीती है ये सब, मैं खा पी लूँगी तो कौन सा पहाड़ गिर पड़ेगा। मैंने कहा- ठीक है, आपकी मेहमाननवाज़ी में अगर ये भी शामिल है, तो आज जो आप कहेंगे, मैं वो सब करूंगी।
वो बड़ा खुश हुआ- वाह, ये हुई न बात!

तो उन्होंने व्हिस्की की बोतल खोली और दो पेग बनाए, मेरे लिए छोटा और अपने लिए पटियाला पेग। दोनों में सोडा और पानी डाल कर एक गिलास मुझे दिया और एक खुद उठाया, पहले उसमें उंलगी डुबो कर एक दो तुपके शराब के बाहर गिराए जैसे कोई आहुति दी हो।
मैंने भी मुस्कुरा कर उनकी नकल की।
उसके बाद दोनों गिलास टकरा कर चीयर्ज किया और फिर एक एक सिप ली।

“ओह हो हो …” सिप लेते ही मेरा तो मुंह कड़वा हो गया। मैंने सर को कई बार झटका सा दिया।
वो बोले- क्यों क्या हुआ?
मैंने कहा- बहुत कड़वी है यार, आप लोग कैसे पी लेते हो?
वो बोले- अरे अभी कड़वी है, मगर इसका असर बहुत ही मीठा होता है। चिंता मत करो खींच जाओ, बाद में इसका सुरूर देखना।

मैंने काफी सारी नमकीन खाई और उसके बाद एक और बड़ी सारी घूंट भरी। मगर ये जो बड़ी सारी घूंट भरी, इससे लगा जैसे मैंने आग पी ली हो, बेहद गर्म अंदर तक जलता हुआ महसूस हुआ, मगर इसके बाद एक बाद तो मेरा सर भी घूमा।
मैंने प्रोफेसर साहब को बताया- यार, क्या खतरनाक चीज़ है ये, मेरा तो सर घूम गया, लगा जैसे मैंने कोई आग पी ली हो, मेरे बदन से गर्मी फूटने लगी है।
प्रोफेसर साहब हँसे और बोले- जानेमन, इसे ही किक कहते हैं। दारू अंदर जाती है तो किक मारती है।

उसके बाद मैंने उनके कहने पर ही सारा गिलास खत्म कर दिया मगर अब मुझे दारू कड़वी नहीं लगी। फिर मैं नमकीन खाने लगी तो प्रोफेसर साहब बोले- अरे क्या नमकीन खाये जा रही हो, ये खाओ, मैं चिकन लाया हूँ।
मैंने कहा- अरे नहीं, हम तो बड़े सनातनी लोग हैं, शुद्ध वैष्णू।
वो बोले- ऐसी की तैसी तेरे वैष्णू की, चल उठा और खा।

उनके कहने पर ही मैंने पहली बार चिकन का एक टुकड़ा खाया। पहले बड़ा अजीब लगा, मगर साला बनाया ही बड़ा टेस्टी था। एक पीस क्या खाया, मैंने तो उसके बाद नमकीन छोड़ ही दी। फिर प्रोफेसर साहब ने दूसरा पेग बनाया।

दूसरे पेग से एक बड़ी सारी घूंट भरने के बाद प्रोफेसर साहब ने एक सिगरेट सुलगाई और मेरे मुंह पर धुआँ मार कर बोले- ये बता अर्चना, कभी सिगरेट पी है?
मैंने कहा- नहीं।
तो उन्होंने अपनी सिगरेट मुझे दी और बोले- तूने आज तक किया क्या है ज़िंदगी में?
मैंने कहा- कुछ नहीं किया।
उन्होंने सिगरेट खुद ही मेरे होंठों से लगा दी।

अब देखा तो मैंने बहुत से लोगों को था सिगरेट पीते हुये, तो मैंने एक कश खींचा, जैसे ही धुआँ मेरे अंदर गया, मुझे खांसी उठी। मगर खांसी को शांत करने के लिए शराब थी। प्रोफेसर साहब खूब हँसे मेरी हालत पर और बोले- तू तो यार … बिल्कुल चूतिया है, आज तक सिर्फ अपने आप को अपने ही जाल में कैद करके बैठी है। खुलो, आज़ाद हो जाओ, और बाहर देखो, दुनिया कितनी हसीन है।
उनकी बात सुन कर मैंने खुद से एक कश लगाया और इस बार मुझे खांसी नहीं आई, कश लगा कर मैंने धुआँ प्रोफेसर साहब के ही मुंह पर छोड़ा।
वो खुश हुये- ये हुई न बात। एक काम और करेगी?
मैंने पूछा- क्या?
वो बोले- अपना आँचल हटा दो।
मैंने कहा- क्या?
वो बोले- इसमें हैरान होने वाली क्या बात है, बाद में भी तो मैं तुझे नंगी करने वाला हूँ, जब अपनी चूत मरवाएगी, तब तो ये साड़ी, ब्लाउज़, ब्रा सब हटा दूँगा। फिर अभी आँचल हटाने में क्या दिक्कत है।

मैंने कुछ नहीं कहा, वैसे ही बैठी रही तो प्रोफेसर साहब खुद उठ कर मेरे बगल में बैठ गए और उन्होंने मेरी साड़ी का दामन मेरे कंधे से हटा कर नीचे मेरी गोद में रख दिया। मेरे वक्ष अब उनके सामने थे, बेशक मैंने ब्लाउज़ पहना था, मगर ब्लाउज़ में से भी मेरा काफी क्लीवेज दिख रहा था। मेरे गोरे बदन को बड़ी हसरत भरी निगाह से देख कर बोले- वाह, क्या मस्त मम्मे हैं.
कह कर उन्होंने बड़े अपनेपन से मेरे एक मम्मे को पकड़ कर हल्के से दबाया।
मैंने कुछ नहीं कहा।
उन्होंने मेरी आँखों में देखा, जैसे देखना चाहते हों कि मैंने उनकी इस हरकत का बुरा तो नहीं माना। मगर मैंने सिगरेट से एक छोटा सा कश लगाया और गिलास से एक घूंट शराब की और भरी। ये जताने के लिए कि उन्होंने मेरी मर्ज़ी के बिना मेरे जिस्म के गुप्त अंग को छूआ, पर मुझे इससे कुछ फर्क नहीं पड़ा।

इस बात से खुश होकर प्रोफेसर साहब ने एक एक और पेग बनाया, मगर इस बार मुझे गिलास देने के बाद उन्होंने अपना एक हाथ घूमा कर मेरे पीछे से सोफ़े की पुश्त पर रख लिया, एक तरह से मैं उनकी आगोश में थी, उनका थोड़ा सा बढ़ा हुआ पेट मेरी बाजू से लग रहा था और उनकी जांघ मेरी जांघ से सटी हुई थी।

उन्होंने एक बड़ी सी घूंट भर कर अपना गिलास रख दिया और मेरी सिगरेट से ही एक कश लेकर सारा धुआँ मेरे क्लीवेज की तरफ फेंका। मैं उनकी चाल समझ गई, मैंने अपनी दोनों कोहनियाँ आगे को एक साथ करके जोड़ कर अपने घुटने के पास रखी जिससे मेरा क्लीवेज और भी बड़ा बन गया।
फिर प्रोफेसर साहब की ओर देख कर बोली- अब ठीक है?
तो प्रोफेसर साहब जैसे खुद पर काबू ही खो बैठे, उन्होंने सीधा हाथ मेरे ब्लाउज़ में डाल कर मेरा मम्मा ही पकड़ लिया और बोले- नहीं, अब ठीक है।

वो मेरे मम्मा दबाने लगे, फिर दूसरा भी दबया, मगर ब्लाउज़ और ब्रा में मेरे मम्मे दबाना उन्हें काफी मुश्किल लग रहा था तो उन्होंने कहा- अर्चना, अपना ब्लाउज़ खोलो।
मैंने कहा- मुझे इसे खोलना नहीं आता.
और उनकी तरफ देख कर बड़े शरारती अंदाज़ में मुस्कुराई।
वो समझ गए और उन्होंने खुद ही मेरे ब्लाउज़ के सभी हुक खोले और न सिर्फ ब्लाउज़ बल्कि ब्रा की हुक भी खोल दी और मेरा ब्लाउज़ और ब्रा दोनों उतार दिये।

मैंने कहा- अरे प्रोफेसर साहब, ये क्या कर रहे हो, आपने तो मुझे नंगी ही कर दिया।
वो बोले- अब सब्र नहीं हो रहा जानेमन।
उसके बाद वो खुद उठ कर खड़े हुये और अपने कपड़े उतारने लगे, मेरे सामने एक मिनट में ही बिल्कुल नंगे हो गए, उनके 6 इंच का लंड अभी ढीला ही था, गुलाबी टोपा बाहर निकला हुआ था।
मैंने पूछा- आप इसे ऐसे ही बाहर रखते हो?
वो बोले- नहीं, आज ही निकाला है, अगर बाहर रखो तो काला पड़ जाता है, अंदर रखो तो गुलाबी रहता है।
वो बिल्कुल मेरे साथ सट कर बैठे।

एक 50 साल का मर्द मेरे साथ बिल्कुल नंगा बैठा था, उन्होंने अपना गिलास उठाया और एक घूंट भरी फिर मेरे पीछे से हाथ घूमा कर लाये, और मेरा एक मम्मा पकड़ लिया और पेग लगाने लगे, तो मैंने भी बिना कोई हील हुज्जत किए उनका लंड पकड़ लिया और उसे हिलाने लगी।
बस मेरे छूने का ही उनका लंड इंतज़ार कर रहा था, थोड़ा सा हिलाने से ही वो साँप की तरह सर उठाने लगा, मैं उस से खेलती रही और वो अकड़ कर 7 इंच का हो गया, मोटा काला, मगर बिल्कुल सीधा और पत्थर की तरह सख्त।

मेरे निप्पल को मसल कर वो बोले- पसंद आया यार अपना?
उनका मतलब लंड से था।
मैंने हाँ में अपना सर हिलाया तो उन्होंने अपने गिलास से दो चार बूंद शराब की अपने लंड के टोपे पर टपका दी, बोले कुछ नहीं।
मतलब साफ था वो चाहते थे कि मैं वो शराब चखूँ।

मुझे भी कोई दिक्कत नहीं थी। मैं आगे को झुकी और उनके लंड के टोपे पर गिरी वो शराब चाट गई। असल में तो मैंने उनका लंड ही चूसना था तो चूस लिया। प्रोफेसर साहब ने मेरे एक मम्मे को अपनी शराब के गिलास में डुबोया और अपने मुंह में लेकर चूस गए।
मैंने कहा- अच्छा जी, हमें लंड पर डाल कर शराब दी और खुद मम्मे से चूस रहे हो?
वो बोले- तो उतार साड़ी, तेरी चूत से भी दारू पी लूँगा, अपने बदन पर कहीं भी दारू गिरा दे, मैं चाट जाऊंगा।

अब मेरी बारी थी, मैं उठ कर खड़ी हुई और पहले अपनी साड़ी खोली, फिर पेटीकोट। पेंटी मैंने पहनी ही नहीं थी, पेटीकोट खोलते ही मैं नंगी हो गई।
मेरी चिकनी चूत देखकर प्रोफेसर साहब खुश हो गए और मुझे झट से नीचे कालीन पर ही लेटा दिया। मैं सीधी लेटी, उन्होंने बोतल से सीधी शराब मेरे बदन पर उड़ेल दी। मैं तो शराब से भीग गई। और झट से मेरे बदन पर यहाँ वहाँ मुंह लगा कर शराब को चाटने लगे.

मैं तो उनके इस तरह अपने बदन को चाटने से मचल उठी, मुझे इतनी गुदगुदी हो रही थी कि मैं बार बार कसमसा रही थी, ज़ोर ज़ोर से हंस रही थी और प्रोफेसर साहब को रोक भी रही थी. मगर वो कहाँ रुकने वाले थे, सर से लेकर पाँव तक वो मेरे सारे बदन को चाट गए।

शराब का पूरा सुरूर था, मैं फुल्ल नशे में थी। आज तो अगर वो मुझे बीच सड़क लेटा कर भी चोद देते तो मैं इंकार न करती। सच में शराब का नशा इंसान को काफी दिलेर बना देता है। मेरा सारा डर, शर्म, संकोच सब कुछ खत्म हो चुका था। और जो प्रोफेसर साहब ने मेरे बदन पर शराब डाल कर चाटा, उन्होंने तो मेरे तन बदन में आग लगा दी। प्रोफेसर साहब ने एक गिलास में छोटा सा पेग बनाया, उसमें अपना लंड डाल कर घुमाया, अच्छे से अपना लंड उस गिलास में हिला कर उन्होंने वो गिलास मुझे दिया, मैंने भी निसंकोच वो गिलास पी लिया।

प्रोफेसर साहब बहुत खुश हुये- वाह, ये हुई न बात!
कहकर वो मेरे ऊपर ही गिर पड़े, उनका सख्त लंड मेरी नाभि में घुसने का रास्ता तलाश कर रहा था, थोड़ा पेट बढ़े होने के कारण मेरी नाभि थोड़ी खुली सी थी, तो प्रोफेसर साहब वहीं ज़ोर लगा रहे थे.
मैंने उनके गाल पर उंगली फेर कर कहा- प्रोफेसर साहब, ये गलत सुराख है।
वो हंस दिये और थोड़ा सा नीचे को हुये, उनके सही जगह आते ही मैंने भी अपनी टाँगें खोल दी। गीली चूत में कड़क लंड बड़े आराम से घुस गया। मेरे पति से तो उनका लंड बड़ा भी था और मोटा भी … तो मुझे तो अच्छा ही लगा, ऐसा लगा जैसे मेरी चूत भर गई हो।

मैंने अपने टाँगें हवा में उठा दी तो प्रोफेसर साहब बोले- तो शुरू करें मेरी जान?
मैंने कहा- शुरू तो हो चुका है मेरे मालिक।
प्रोफेसर साहब ने मेरे होंठों को चूमा और अपनी कमर चलानी शुरू की।

छोटी सी दिक्कत ये थी कि हम दोनों का थोड़ा थोड़ा पेट था जिससे हम दोनों को असुविधा हो रही थी. तो प्रोफेसर साहब अपने घुटनों के बल बैठ गए, अब उनका पेट मेरे पेट के ऊपर टिक गया, और नीचे से प्रोग्राम फिट हो गया.
अब जो उन्होंने अपनी कमर चलाई, तो बड़े आराम से चुदाई की गाड़ी धुकधुक धुक धुक चल पड़ी।

हम दोनों में से किसी को भी जल्दी नहीं थी। सुबह 10 बजे मैं उनके घर आई थी, अभी 11:15 बजे थे और तीन बजे तक मैं बिल्कुल फ्री थी। वो तो रहते ही अकेले थे, तो वो तो फ्री ही फ्री थे। इसलिए वो बड़े आराम आराम से लगे हुये थे, मेरे बदन को निहारते हुये, मेरे मम्मों से खेलते हुये, मुझे बार बार चूमते चाटते हुये वो चुदाई कर रहे थे।

इस दौरान हम दोनों में कोई खास बात नहीं हुई क्योंकि हम दोनों एक दूसरे को पूरी तरह से भोगने में लीन थे। मैं भी उनको चूम चाट रही थी और वो भी मुझे खा रहे थे।

आधे घंटे तक उन्होंने मेरी चुदाई करी, इस दौरान मैं दो बार झड़ चुकी थी मगर मैंने अपनी उत्तेजना को अपने अंदर ही छुपा लिया, मैंने ज़ाहिर नहीं होने दिया कि मेरा पानी गिर चुका है.
हालांकि उन्होंने मुझे कहा- जानेमन पानी बहुत छोड़ रही हो?
मैंने झूठमूठ ही कह दिया- जब मुझे मज़ा आता है, तो मेरा बहुत पानी गिरता है।
फिर प्रोफेसर साहब बोले- यार, अब तो बहुत हो गया, क्या मैं अपना माल तुम्हारे अंदर ही गिरा दूँ?
मैंने कहा- सब कुछ आपका है, जहां चाहे गिरा दो।

तो फिर उन्होंने मेरे अंदर ही पिचकारी मारी। मुझे साफ महसूस हुआ, जब उनका गर्म वीर्य मेरी चूत के अंदर टपका।
माल गिरा कर वो शांत से हो गए, फिर मेरे साथ ही लेटे रहे।

कुछ देर लेटने के बाद वो उठकर सोफ़े पर बैठ गए, मैं उनके सामने कालीन पर नंगी ही लेटी रही। उन्होंने एक पेग और बनाया और पीते हुये मुझसे पूछा- अर्चना, आज क्या क्या तुमने पहली बार किया?
मैंने कहा- आज तो सब कुछ पहली बार ही हुआ है मेरे साथ।
वो बोले- मुझे डीटेल में बताओ?
मैंने कहा- आज मैंने पहली बार अपने पति से बेवफ़ाई की, उनके होते हुये, किसी गैर मर्द को अपना जिस्म सौंप दिया, अपनी शादी से बाहर सेक्स किया। पहली बार मैंने शराब पी, सिगरेट पी और नॉन वेज भी पहली बार खाया। और एक और बात … पहली बार मैं अपने घर बाहर किसी और जगह पर चुदी।

प्रोफेसर साहब बोले- तो आज क्या आज तक सिर्फ अपने घर में ही चुदवाती रही?
मैंने कहा- हाँ, आज तक कभी घर से बाहर गए ही नहीं।
प्रोफेसर साहब ने पूछा- क्यों हनीमून पर नहीं गए?
मैंने कहा- नहीं, उस वक्त इनके बिज़नस की कोई दिक्कत थी, तो जा ही नहीं पाये।

प्रोफेसर साहब बोले- तो पति को धोखा देने की क्यों सोची?
मैंने कहा- अब पति में इतना दम ही नहीं कि वो अपनी पत्नी को ठंडी कर सके तो औरत तो बाहर जाएगी ही।
“पर अभी तो तुम्हारी शादी को अरसा ही कितना हुआ है?”
मैंने कहा- 5 साल हुये हैं।

प्रोफेसर साहब मुस्कुराए और बोले- तो क्या एक राउंड और खेलें?
मैंने किसी फिल्मी खलनायिका की तरह अपनी मोटी जांघ पर हाथ फेरा और बड़े नशीले अंदाज़ में बोली- एक राउंड क्यों, जीतने राउंड चाहो, उतनों राउंड खेलो प्रोफेसर साहब। तीन बजे तक मैं आपके पास हूँ, अब ये आप पर है, जितना आप में दम है, उतने राउंड होने दो।
प्रोफेसर साहब हँसे- साली कुत्ती, तू तो यार बिल्कुल रांड है रांड।
मैंने कहा- अभी सब्र रखो प्रोफेसर साहब, पहले आप खेल लो। फिर जब मैंने खेलना चालू किया, तब देखना।

हम दोनों हंस दिये और प्रोफेसर साहब ने फिर दोनों गिलास भर दिये।
“इधर आ मेरी जान, पहले शराब फिर शवाब!”
और मैं खुशी से इठलाती हुई उठ कर प्रोफेसर साहब की गोद में जा बैठी।

उसके बाद शराब और शबाब के दौर चलते रहे, नशा इतना हो गया कि हम दोनों को ही याद नहीं कि हमने कितनी बार चुदाई की।

तीन बजे मुझे घर पहुँचना था, मगर 7 बजे प्रोफेसर साहब मुझे घर छोड़ कर आए। घर आते ही मैं सो गई। मुझे कुछ होश नहीं रहा, न अपना न अपनी बच्ची का।
रात के करीब 3 बजे मेरे आँख खुली, मैंने आस पास देखा, तो कुछ समझ में आया कि मैं अपने ही घर में हूँ।

अगले दिन सुबह मैं 10 बजे उठी। उसके बाद तो प्रोफेसर साहब से मेरा अक्सर मिलना जुलना हो गया। सेक्स तो एक वजह थी ही, मगर दूसरी वजह थी, खाना पीना, खुल्ला हँसना बोलना, एक दूसरे को खूब गली गलौच, जलील कर कर के सेक्स करना।
बेशक मेरे घर में नहीं पता, मगर मैं शराब, बीयर, वोदका, रम, जिन, बेकार्डी, टकीला, हर तरह की शराब पी लेती हूँ। सिगरेट बड़े आराम से पीती हूँ। नॉन वेज भी हर तरह का खा लेती हूँ। सिर्फ यही नहीं … प्रोफेसर साहब ने मुझे ये भी सिखाया कि जब जिससे भी दिल करे, उससे सेक्स करने की कोशिश करो। दिल में ये मत रखो कि यार ये मेरे बारे में क्या सोचेगा।

इसी वजह से मैंने अपनी ही क्लास के एक स्टूडेंट से सेक्स किया।
मगर जब अगली बार मैं उससे मिलने गई, तो साला अपने 3 दोस्त और ले आया, और फिर चारों में मिल कर मुझे चोदा।

वो कहानी, फिर कभी। फिलहाल इतना ही, गुड बाय, गुड लक।
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