एक उपहार ऐसा भी- 26

(Ek Uphar Aisa Bhi- Part 26)

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नमस्कार दोस्तो, मेरी इस धारावाहिक कहानी में सेक्स के साथ प्रेम का समावेश अधिक है. ये मेरी कलम का गुण या दोष है कि मैं सेक्स को गंदे तरीके से नहीं लिख पाता हूँ.

अभी ख़ुशी की शादी के कार्यक्रम की कहानी लिख रहा था. ख़ुशी वरमाला लिए स्टेज की तरफ बढ़ रही थी और सभी की निगाहें उस पर ही टिकी थीं.

अब आगे:

जो जहां था … वो वहीं ठहर गया. जिसको ये दृश्य नजर नहीं आ रहा था, वे कुर्सियों पर चढ़ गए. कैमरा मैन हर एंगल से इस दृश्य को बटोरने में लगे थे. कोई मोबाइल में वीडियो बना रहा था, तो कहीं ड्रोन कैमरे पिक्चर ले रहे थे … तो कोई दम साधे भी खड़ा था.

मैं भी दम साधे खड़े लोगों की श्रेणी में था. उधर दूल्हा वैभव अपनी शेरवानी ठीक करते हुए खुद की किस्मत पर इतरा रहा था.

वादियों में फिजाओं में एक खुशबू सी घुल गई थी. फिर जब अप्सराओं की महारानी मेरी ख़ुशी, जब स्टेज पर पहुंची … तो पटाखे की चमक से आसमान जगमगा उठा और तालियों की गूँज से समां में बहार आ गई.

स्टेज पर वरमाला की रस्म भी करवाई गई. ये रस्म पुरातन काल के स्वयंवर से कम ना थी. इसके बाद उपहार देने वालों का तांता सा लग गया.

मैं स्टेज के सामने कुछ दूरी पर ऐसे बैठ गया, जहीं से खुशी मुझे देख सके और मैं खुशी को देख सकूं. मैंने बैठ कर फ्रूट सलाद, आइस्क्रीम, ड्रिंक्स और कुछ कुछ खा पीकर टाइम गुजारा.

मैंने आज खुशी का खरीदा हुआ सूट पहन रखा था, जिसकी वजह से आज मैं और भी ज्यादा हैंडसम लग रहा था. मेरी तारीफ़ स्टेज से स्वयं खुशी ने भी नजरें मटकाकर कर दी थी.

वहीं आंचल प्रतिभा और सुमन भी पास ही आ जा रही थीं, तो उन्होंने भी निगाहों ही निगाहों में मेरी तारीफ कर दी.

प्राची भाभी ने पास आकर तारीफ़ की थी और कुछ देर कंपनी भी दी थी.

हीना और नेहा भी मेरे लंड का स्वाद ले ही चुकी थीं … इसलिए जब उनसे नजरें मिलतीं … तो एक अंदाज के साथ आंखों ही आंखों में बातें भी हो जातीं और उन दोनों ने भी मेरी खूब प्रशंसा की.

लेकिन अब मुझे लगा कि मैं स्टेज के सामने बैठे रहकर गलती कर रहा हूँ. क्योंकि खुशी का पूरा ध्यान मुझे पर केंद्रित हो गया था और मेहमानों तक ये संदेश पहुंचना गलत प्रतीत हो रहा था.

फिर मुझे अपने उपहार की याद भी आई, तो मैं कमरे में जाकर वो उपहार ले आया, जिसे मैं खुशी के लिए घर से खरीद कर लाया था, जिसका जिक्र मैंने पिछली एक कड़ी में किया था.

अब मैंने स्टेज पर जाने के लिए साथी तलाश की … तो मुझे पायल नजर आई. वो पार्टी के लिए स्वीवलैस ब्लाउज के साथ साड़ी पहनकर आई थी.

पायल आज और भी कयामत लग रही थी और पूर्ण स्त्री का आभास करा रही थी. पायल ने अपने गोरे नाजुक बदन को महंगी काली रेशमी साड़ी में लपेट रखा था. उसके साथ कोई और भी थी, जो पायल जैसी ही गोरी-चिट्टी और सुंदरता की खान थी.

उसने लांग स्लीव वाली ब्लाउज के साथ पिंक कलर की साड़ी पहनी थी, जिसमें उसके जिस्म का रंग पूरी तरह मैच हो रहा था.

पायल ने पास आकर मुझे परिचय करवाया- ये मेरी सहेली नताशा है.

मैंने हाय कहा, तो उसने हाथ बढ़ा दिया और उसके नाजुक हाथों के स्पर्श ने मेरे हृदय के तारों को झंकृत कर दिया.
पायल ने कहा- ये मेरी बैचमेट है, मेरी सबसे अच्छी सहेली और राजदार है.

मैं उसकी बातों का मतलब समझ रहा था. पर मैं अपलक नताशा को ही निहार रहा था.

तभी पायल ने मुझसे एक प्रश्न किया और मैं धर्मसंकट में पड़ गया.
पायल ने कहा- अच्छा तो अब ये बताओ हम दोनों में से कौन ज्यादा सुंदर है.

अब भला मैं क्या जवाब देता … अट्ठारह उन्नीस साल की दो अप्सराओं के बीच सौंदर्य की इस प्रतिस्पर्धा के बीच मैं फंस गया था.

मैंने बात को चतुराई से घुमाते हुए कहा- अच्छा पहले ये बताओ कि जीवन के लिए पानी जरूरी है या वायु … और तुम्हारी दोनों आंखों में से सबसे ज्यादा खूबसूरत कौन है.
अगर मेरे ये दोनों प्रश्न कठिन है … तो ऐसे ही तुम दोनों में से कौन ज्यादा सुंदर है … ये बता पाना कठिन है.

वो दोनों ठहाके मार के हंसने लगीं.

फिर पायल ने कहा- आप तो ठरकी निकले … किसी एक को चुन ना सके. दोनों को लाइन पर लेना चाहते हो.
मैंने कहा- अरे यार, ऐसी बात नहीं है. तुम तो मेरी इज्जत का भाजी-पाला करने में ही लगी रहती हो.
पायल ने कहा- सॉरी बाबा … अब ऐसी मस्ती नहीं करूंगी.

फिर मेरा मूड कुछ ठीक होता देख कर उसने मेरे पास आकर कान में कहा- वैसे हम दोनों ही आपकी लाइन पर हैं. नताशा तो लेती भी अच्छा है.
मैंने कहा- क्या मतलब?
तो पायल ने हड़बड़ा के कहा- कुछ नहीं. हम चलते हैं.

मैंने पायल को रोका और स्टेज पर चलने को कहा. फिर हम तीनों स्टेज की ओर चल पड़े. वो दोनों अप्सराएं मेरे सामने चल रही थीं और मैं पीछे.

पायल की बातों ने मेरे अन्दर के शैतान को छेड़ दिया था. मैं नताशा के कपड़ों के ऊपर से ही उसकी गांड को निहारने लगा. उसके कटाव भरा बदन बड़ा दिलकश था. अभी-अभी किशोरी से नवयौवना हुई उसकी जवानी मुझे मुँह चिढ़ा रही थी.

बलखाती कमर सुराहीदार गर्दन … सुडौलता की पराकाष्ठा को छूते स्तन … थिरकन में मयूर को मात देते उसके नितंब ऐसे कि फूल की मार भी ना झेल सकन वाले हों. उसका दूध से भी सफ़ेद गोरा रंग … मन को बरबस ही तड़पाने लगा था.

बत्तीस-सी का वक्ष … और बत्तीस-डी के नितंब … नाभि के नीचे बंधी साड़ी. चूड़ियों के आकार के बाला, उसके रूप को ऐसा निखार रहे थे … मानो ये कई नवयुवती ना होकर कोई काम की दवी हो.

वैसे तो पार्टी में आंखों को सेंकने लायक बहुत सी हसीनाएं थीं. पर नताशा का रूप लावण्य ऐसा था … मानो कई एक पुष्प ही पूरी बगिया की सुंदरता के लिए काफी हो.

मैं इन अहसासों में खोया हुआ स्टेज के समीप पहुंचा, तो मेरी दीवानगी ने अपना रूख बदल लिया. कोई चाहे कितनी भी सुंदर क्यों ना हो … खुशी ही मेरे दिल की रानी थी.

खुशी को देखते ही मैं एकबार फिर खुशी और गम के उहापोह में खोने लगा. खुशी की सुंदरता … उसका साहस … उसका समर्पण … उसका प्रेम मुझे आनन्दित कर रहा था, तो उसकी शादी किसी और से … उसका दूल्हा कई औरों से … ये सब बातें मुझे विचलित भी कर रही थीं.

मैं वैभव के पास पहुंचकर गले मिलकर उसे बधाई देकर खुशी तक पहुंचा. मैंने उसे गिफ्ट देकर बधाई देकर आगे बढ़ना चाहा … पर खुशी ने मुझे वहीं स्टेज में गले से लगा लिया. वैसे बड़े घर घरानों में गले लगाना कोई बड़ी बात नहीं होती है. पर ये मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी.

मैंने खुशी को खुद से अलग किया और चलने लगा था … तो पायल ने मुझे रोक कर फोटो खींचने के लिए कहा.

मैं भी रूक गया सबने ग्रुप फोटो खिंचवाई.

फिर मैं जल्दी ही वहां से निकल गया. ज्यादा देर आंसू रोक पाना मेरे वश में ना था.

खुशी ने मेरा गिफ्ट आंचल को देकर अपने पर्सनल बैग में रखवाया. इस शादी में खुशी से मेरी आखिरी मुलाकात थी. क्योंकि उसके बाद मैं सीधे ही कमरे में चला गया.

कमरे में कुछ देर मैंने अकेले ही बहुत सी बातें सोचकर आंसू बहाए … और बहुत सी बातों के लिए खुद की किस्मत को सराहा. फिर कब बिस्तर पर नींद लग गई … पता ही नहीं चला.

लगभग रात का आधा पहर बीत गया था. तब मेरे फोन की घंटी से मेरी तंद्रा टूटी. मैंने फ़ोन उठाया.

तो प्रतिभा ने कहा- हैलो … बड़े घोड़े बेच कर सोते हो यार. … हम कब से तुम्हारे दरवाजे के बाहर खड़े हैं.

मैंने सॉरी कहा और दौड़ कर दरवाजा खोला. प्रतिभा सुमन को लेकर कमरे में आ गई. गेट बंद करके मैं भी उनके पीछे आ गया.

अन्दर आते ही प्रतिभा ने मुझे गले लगाया और कहा- क्यों जनाब काम अधूरा छोड़ कर भागने का इरादा है क्या?
जवाब में मैंने कहा- बोलो तो टिकट ही कैंसल करवा दूं … फिर जब तक तुम गिड़गिड़ाओ नहीं … तब तक कपड़े ही ना पहनने दूं!

प्रतिभा ने कहा- हाय … तुम्हारी इसी अदा ने तो सबको तुम्हारा दीवाना बना रखा है. खैर … मैं तो फिर और कभी तुमसे मिल लूंगी … क्योंकि मुझे हड़बड़ी का काम पसंद नहीं. पर अभी तो तुम मेरी सहेली सुमन की इच्छा पूरी कर दो. बेचारी मेंसस की वजह से अब तक तुम्हारे पास भी नहीं आ पा रही थी.
मैंने विनम्रता से कहा- जो आज्ञा देवी.

प्रतिभा ने हंसते हुए पहले मेरे गाल को किस किया. फिर होंठों का लंबा चुंबन देते हुए बाहर जाने लगी.
उसने जाते जाते कहा- खुशी मुझे ढूंढ रही होगी. आज उसके पास रहना जरूरी है. सुमन, तुम मजे करो.

प्रतिभा के जाने के बाद मैंने दरवाजा बंद किया. जब सुमन के पास आया तो वह बहुत शरमा रही थी.

मैं उसके पास बैठा और बनावटी ढंग से खांसते हुए उससे कहा- तो शुरू करें!

सुमन ने बिना कोई उत्तर दिए सर झुका लिया. सुंदर हसीनाओं को भोग लेने के पश्चात उस भारी देह की युवती के शरीर पर आकर्षित होने लायक बहुत कम चीजें थीं. पर उसकी लज्जा ने उस बाकी सभी अप्सराओं से ज्यादा खूबसूरत बना दिया.

मैं कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहता था. इसलिए मैंने उससे उसके अतीत की कुछ बातें की और उसके समीप बैठ कर उसका भरोसा जीतते हुए उसकी वासना को जगाने का प्रयत्न करने लगा.

मैंने उसकी जंघा को सहलाया, उसकी पीठ सहलाई … और उसके कंधे पर चुंबन अंकित कर दिया.

पूछने पर उसने बताया कि वो सिर्फ चार पांच बार ही चुदी है. पहली चुदाई उसने नशे की हालत में की थी. … और बाकी चुदाई उसने सहेलियों के दबाव में आकर उनके सामने की थी. मतलब एक तरह की रैंगिंग जैसा सेक्स हुआ था. आज पहली बार वो चुदाई का आनन्द पाने आई है.

मैंने कहा- देखो सुमन, लज्जा नारी का वस्त्र है … नारी जब कमरे में कदम रखती है, तब भी निर्वस्त्र अच्छी नहीं लगती. अर्थात लज्जा का होना अच्छी बात है. लेकिन पुरुष जब प्रयत्न से नारी को निर्वस्त्र करना चाहे, तो उसका सहयोग करना चाहिए. अर्थात धीरे धीरे लज्जा का त्याग करना चाहिए.

चुदाई का असली आनन्द जिस्मों के मिलन से नहीं आता. असली आनन्द तो रूह के मिलन से आता है और रूहें आपस में तब मिलती हैं, जब दोनों पूर्ण तृप्त हों. सुमन तुम पढ़ी-लिखी समझदार हो. मेरी बातों को समझ रही होगी.

ऐसा कहते हुए मैंने सुमन को अपनी बांहों में भर लिया. उसके अड़तीस चालीस की साइज के खरबूजे मेरे हाथों को सुकून पहुंचाने लगे.

सुमन ने आनन्द से आंखें बंद कर लीं. मैंने उसके तप्त होंठों पर अपने होंठ टिका दिए और रसपान करने लगा. सुमन का चेहरा वासना से लाल होने लगा … और देह तपने लगी.

सुमन ने भी स्वतः मेरा साथ देना प्रारंभ कर दिया. जब हम एक दूसरे में खो जाने को आतुर होने लगे … तब मैंने वस्त्र का त्याग करना उचित जाना. सुमन ने इस पल फिर से लज्जा दिखाई. पर उसके संकोच ने मुझे और भी उकसाने का कार्य किया.

मैंने समय ना गंवाते हुए उस गोरी और भरे पूरे देह की युवती को बिस्तर में लिटाया … और उसके बड़े घेराव वाले भूरे एक निप्पल को मुँह में भर लिया.

सुमन तड़प उठी. उसने अपनी उंगलियां मेरे बालों में फंसा दीं … और खींचने लगी.

मैंने सुमन की बेचैनी जानकर खुद को उसके नीचे भाग तक सरका लिया. और उसकी पैंटी को उतार दिया. मैं तो पहले ही निर्वस्त्र था, तो इस चुंबन के दौरान मेरा बड़ा हथियार उसके बदन को स्पर्श करके सुमन को अपना दीवाना बना रहा था.

सुमन की फूली हुई गोरी चूत चिकनी और साफ थी, जो इस मुलाकात की तैयारी का बखान कर रही थी. मैंने अपनी एक उंगली चूत की दरार पर ऊपर से नीचे तक फिराई, तो सुमन सिहर उठी.

ईस्सस्स … की आवाज उसके कंठ से स्वतः ही प्रस्फुटित हो गई.

मैंने 69 की पोजिशन ले ली और चूत चाटने लगा. पर मुझे प्रतिउत्तर ना मिला. फिर भी मैंने मखमली चूत को चाटने का और उसके स्वादिष्ट रस को चखने का मौका नहीं गंवाया.

मैंने बहुत देर तक चूत चाटने को बाद सुमन के चेहरे के पास लंड ले जाकर चूसने को कहा, तो सुमन ने कहा- ये बहुत बड़ा है … मेरा मुँह दुखेगा … और मैंने ये पहले किया भी नहीं है … इसलिए मुझे ये पसंद नहीं है.

पर मैंने जोर देते हुए कहा- कब तक अनाड़ी रहोगी जानेमन. कभी तो सीखना पड़ेगा ना!

इस पर उसने भी बात मानकर धीरे धीरे मेरा लंड चूसना शुरू कर दिया.

जब कोई आहिस्ते आहिस्ते लंड चूसता है … तो मजा और कई गुना बढ़ जाता है. मैं भी इस मजे में डूब गया था. पर सुमन ने जल्दी ही लंड मुँह से निकाल दिया और कहने लगी- मुँह में ही सब कर लोगे … तो आगे क्या करोगे?

मैंने हंसते हुए कहा- वैसे सभी चीजों के लिए मेरी एनर्जी अधिक से भी अधिक है. पर लगता है अब मुनिया रानी को सब्र नहीं हो रहा है?

मैं नीचे जाकर पोजीशन में आ गया.

मैंने लंड चूत में डालने से पहल लंड से चूत को अच्छी तरह सहलाया. सुमन तड़प उठी. उसकी चूत की दीवारें आपस में चिपकी हुई सी थीं. मतलब सुमन की ढंग से चुदाई नहीं हुई थी.

मैंने उसकी पानी छोड़ती चूत में लंड पेल दिया.

सुमन चीख उठी. पर उसका दर्द ज्यादा देर ना रहा … क्योंकि मैंने भी उसे संभलने का मौका दे दिया.

लेकिन कुछ ही देर बाद घमासान चुदाई का दौर शुरू हो गया. मैं चोदता रहा … हर तरीके से … हर पोजीशन में उसे चोदा. सुमन भी चुदती रही … पता नहीं उसकी कसी हुई चूत का आज क्या हाल होना था. क्योंकि रोज की चुदाई की वजह से मेरा पानी जल्दी गिरने वाला नहीं था.

सुमन तो कई बार अपना रस बहा चुकी थी. देर तक की चुदाई के बाद पसीने से तर-बतर और बेहाल सुमन ने हाथ जोड़कर चुदाई रोकने को कहा, तो मुझे चुदाई रोकनी पड़ी.

मैं उसकी जांघ के सामने बैठकर पन्द्रह मिनट मुठ मारता रहा … तब जाकर मेरे लंड ने वीर्य का त्याग किया.

मेरे कामरस से सुमन के पेट नाभि और घाटी पूरी तरह भीग गए. सुमन ने मुँह बनाया और बाथरूम चली गई. मैंने भी तौलिए से खुद को पौंछा और नाइट गाउन पहन कर लेट गया.

सुमन ने कपड़े पहने और वो जाने से पहले मुझे किस करने लगी.
मैंने कहा- और नहीं चुदोगी?
तो उसने आश्चर्य से मुँह बनाते हुए कहा- ना बाबा … अभी तो कम से कम एक साल का डोज हो गया.

हम दोनों हंसने लगे और वो चली गई.

मैं भी वैसे ही सो गया. सुबह उठा तो देखा कि खुशी, पायल, प्रतिभा के बहुत से कॉल आए थे. फ़ोन किसी कारण से बंद हो गया था. जब मैंने खुशी को कॉल किया, तो उसका नम्बर बंद बताने लगा.

अब मैं खुद ही नीचे गया तो देखा कि मेहमान होटल से जाने लगे थे. पता चला कि खुशी की विदाई सुबह सुबह ही हो गई थी.

प्राची भाभी सबको विदा कर रही थीं.
मैंने कहा- भाभी, मुझे भी तीन बजे निकलना है.
भाभी ने मुस्कुरा कर कहा- ठीक है. मैंने तुम्हारा फ़ोन नम्बर ले लिया है. कभी बुलाऊंगी, तो चले आना.

मैंने मुस्कुरा कर हां कहा.

फिर भाभी ने कहा- पायल तुम्हें छोड़ आएगी. तुम फ्रेश होकर रेडी रहना. सब रात भर के जगे हैं. तो सो रहे होंगे.

मैं तैयार होकर पायल का वेट कर रहा था. पायल दो बज भागते हुए मेरे पास आई.

पायल- सॉरी मैं लेट हो गई … चलो जल्दी … नहीं तो फ्लाइट मिस हो जाएगी.
मैंने छेड़ा- तो इतनी जल्दी है … हमें यहां से भगाने की!

पायल ने मुँह बनाया और कहा- आपको तो जिन्दगी भर विदा ना करूं … पर आपने जाने की बात कही थी, तो मुझे ये ड्यूटी मिली है. अब जाओ … मैं नहीं छोड़ने वाली आपको.

इस पर मैंने उसे बहुत मनाया, तब वो मानी.

वो मुझे नीचे दादी के पास ले गई. आंचल पास खड़ी थी. उसने कुछ गिफ्ट दादी को पकड़ाया, जिस पैर छूने पर दादी ने मुझे दे दिया. आंचल की आंखों पर विदाई के आंसू थे. पर छलकने से उसने रोक रखा था.

आंचल ने सिर्फ एक वाक्य कहा- फ़ोन करना.

और मैंने हां में सर हिला कर मुँह फेर लिया … नहीं तो मेरी आंखें भी छलक जातीं.

पायल ने एयरपोर्ट पहुंचने से पहले कार में ही मुझे कसके किस किया और रोने लगी.

मैंने उसे समझाया और फिर मिलने का वादा किया.

इस शादी ने मुझे बहुत कुछ दिया. पर अभी बहुत कुछ बाकी है … अधूरा है. फिलहाल कहानी यही तक समाप्त की जा रही है.

निरंतर प्रेम और स्नेह के लिए धन्यवाद.

आप सबको मेरी ये कहानी कैसी लगी.
आप अपनी राय मुझे इस पते पर दे सकते हैं.
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