डाक बंगले में गांड चुदाई- 1

(Dak Bungalow Me Gand Chudai - Part 1)

आजाद गांडू 2020-11-13 Comments

मेरी पोस्टिंग दूरदराज गांव में हुई. वहां एक डाक बंगला था. उसके केयरटेकर को गांड चुदाई करने का शौक था. एक दिन मैंने उसे एक लड़के की गांड मारते देखा और फिर …

अन्तर्वासना के पाठको को मेरा नमस्कार.
आपके लिए एक नयी कहानी प्रस्तुत है. आशा है आपको पसंद आयेगी.

मेरी उम्र अभी 27 साल है और जिस वक्त की ये घटना है उस वक्त मेरी नई नई नौकरी लगी थी. पोस्टिंग जिले से कुछ किलोमीटर दूर एक गांव में दे गयी थी.

जिस गांव में मैं रहता था वो शहर से 2-3 किलोमीटर की दूरी पर था. शहर भी ज्यादा बड़ा नहीं था. बल्कि उसे कस्बा कहूं तो ज्यादा सही रहेगा. आबादी कम और हरियाली ज्यादा. प्रकृति वहां हमेशा मुस्कराती हुई दिखाई देती थी.

नई नौकरी होने के कारण मैं जूनियर था. मैं अपने विभाग में सबसे नया था. वहां पर ज्यादा काम भी नहीं था. इसलिए मैं काम निपटा कर ड्यूटी के बाद सुबह-शाम डाक बंगले की ओर सैर पर निकल जाता था.

यह इस क्षेत्र का जंगल में स्थित एक महत्वपूर्ण डाक बंगला था. किन्हीं राजा साहब ने इसको बनवाया था जो जंगल के बीच एक टीले पर था. बगल से नदी निकलती थी जिस पर बांध बना हुआ था।

चारों ओर बड़ा सा बगीचा है. जाने कहां कहां से लाकर पेड़ व फूलों के पौधे लगाए गए थे. राजा साहब शिकार व मनोरंजन के लिए प्रेमिकाओं व दरबारियों के साथ यहां आते थे.

मगर आजकल बड़े अफसर, नेता व मंत्री यहां ठहरने आते थे. कई बार महत्वपूर्ण मीटिंग भी यहीं होती थी.

डाक बंगला गांव से बाहर बना हुआ था जिसके आसपास के इलाके में काफी सुनसान सा पड़ा हुआ था.

गांव में इस डाक बंगले के मालिक शेखर जी थे. शेखर जी के साथ मेरी अच्छी बोलचाल हो गयी थी. उनके साथ अक्सर बेडमिंटन की बाजी हो जाती थी.

शेखर जी गणित व अंग्रेजी में एम.ए./एम.एस.सी. थे. वे भी यहां पांच-छः साल से रह रहे थे.
अट्ठाईस-उनत्तीस साल के होंगे. कद काठी में पूरे लंबे, पूरे हट्टे कट्टे, गोरा रंग लिये।
पहले ट्यूशन करते थे और फिर नौकरी लगने पर यहां आ गये थे.

उनका किस्सा सुनने में आता है कि उन्होंने एक आदिवासी युवक को ऐसा प्रशिक्षण दिया कि वह आईएएस में सिलेक्ट हो गया.
तब से शेखर जी का नाम बहुत प्रसिद्ध हो गया था.

मुझे यहां आये हुए 5-6 महीने हो गये थे.

एक सुबह ऐसे ही दौड़ लगाता और एक्सरसाइज करता हुआ मैं डाक बंगले पर जा पहुंचा.

बंगला काफी बड़ा था और किवाड़ खुले रहते थे. कौन आ रहा है और कौन जा रहा है ज्यादा कुछ भेद नहीं रहता था किसी को.

जैसे ही मैं अन्दर आया तो सामने रसोईघर में एक युवक सामने अपने नग्न गोरे नितम्बों को हिलाता हुआ एक महिला के ऊपर कुत्ते की तरह चढ़ा हुआ था. महिला फर्श पर टांगें चौड़ी किये चित लेटी हुई थी.

महिला की टांगें युवक की कमर पर लिपटी थीं और उसकी योनि में युवक के लिंग के धक्कों के साथ उसके पैरों की पायल छन छन की आवाज करती हुई बता रही थी कि दोनों चुदाई में पूरी तरह से डूबे हुए हैं.

अंदर-बाहर … अंदर-बाहर … गचागच धक्कमपेल चल रही थी.
युवक की चोदन गति देखकर लग रहा था कि उसको बहुत दिनों के बाद योनि सुख प्राप्त हो रहा है.

फिर उसने एकदम से लंड उसकी योनि में अंदर तक पेल दिया और वो नीचे लेटी महिला चिल्ला उठी- बस … आह … बस … धीरे … ओह्ह … नहीं!

मगर लौंडा पूरे जोश में था. उसके चूतड़ तेज तेज ऊपर नीचे चलते हुए योनि को अंदर तक भेद रहे थे.

मैं ज्यादा देर वहां रुक नहीं पाया और उन्हें चुदाई करते हुए वहीं पर छोड़कर बाहर बरामदे में आ गया.

तभी दूर से एक व्यक्ति आता हुआ दिखाई दिया.

मैं उसे पहचानता था. मैंने कहा- कल्लू? तू?
कल्लू बोला- साहब, मेरी घरवाली आई होगी. जरा आवाज देकर बुला देंगे?
मैंने कहा- ठीक है, तुम बाहर ही रुको, मैं बुलाता हूं.

मुझे समझते देर न लगी कि अंदर जिस महिला की चुदाई चल रही है वो कल्लू की ही लुगाई है.

मैं अंदर पहुंचा ही था कि वह दूध का बर्तन लिये बाहर की ओर आती हुई दिखाई दी.

शायद वह दूध देने आई थी और फिर चुदाई भी करवा आई.

उसने आधा घूंघट किया हुआ था. उसके अधरों पर एक संतोषपूर्ण मुस्कराहट थी.
सामने कल्लू को देखा तो बोली- आज तुम नहीं दिखे तो मैं ही दूध देने चली आई. कहां चल गये थे?

कल्लू- मैं तो शाम की भैंस दोहने गया था. आज वह कहीं चला गया है। उसका भाई बुलाने आया था।
ये सब बातें होने के बाद कल्लू ने मुझसे इजाजत मांगी और वो दोनों वहां से साथ साथ बाहर निकल गये.

इतने में ही भूरा चाय का कप हाथ में लिये हुए मेरी ओर बढ़ता आ रहा था. भूरा वही युवक है जो कुछ देर पहले रसोई में कल्लू की लुगाई पर चढ़ा हुआ था.

वो भी शर्मा रहा था और मंद मंद मुस्करा रहा था.
शायद योनि सुख का आनंद अभी भी उसके तन में बह रहा था.

मैंने पूछा- शेखर जी कहां हैं?
भूरा- भाईसाहब तो गांव में गये हुए हैं. आते ही होंगे.

भूरा को शेखर जी ने कुक की पोस्ट पर रखा हुआ था. वह 20-22 साल का हट्टा कट्टा नौजवान था.

यहां पर गांव में अधिकतर लोग सांवले रंग के ही थे. मगर भूरा गोरे रंग का था. भूरा के नैन नक्श तीखे थे और उसके बाल भूरे रंग के थे इसलिए उसका नाम भूरा रख दिया गया था.

यह बहुत चालू किस्म का लड़का था. चूंकि पहले मैं अपना खाना स्वयं ही बनाता था. फिर शेखर जी से दोस्ती हो गयी. वो कहने लगे कि जब भूरा मेरे लिये और गेस्ट के लिए खाना बनाता ही है तो आप भी यहीं खा लिया करें.

मैं राजी हो गया और शेखर जी को पेमेंट करने की बात कही मगर वो मना कर गये. कहने लगे कि एडजस्ट हो जाता है.

उस दिन के बाद से मैं अक्सर यहां आ जाता हूं. मगर पेमेंट का मना करने के बाद मैं रोज नहीं खाता यहां. कभी कभी ही आ जाया करता हूं.

शेखर जी खुद भी एक बहुत अच्छे शेफ थे. कुछ नॉन वेज डिश में तो उनकी जैसे मास्टरी है.

एक बार एक मिनिस्टर साहब तो उन्हें अपना पी. ए. बनाना चाहते थे पर उन्होंने बहाना कर दिया कि कई अफसर उनकी इंगलिश ड्राफ्टिंग व उनकी बनाई डिश के फैन हैं।

वे मेरे से बड़ी दोस्ती रखते थे. मैं जब किसी वजह से न आ पाता तो मेरे पास गांव में मेरे निवास पर पहुंच जाते थे.
हम दौड़ में कम्प्टीशन करते थे.
वे अक्सर पीछे रह जाते थे. फिर मेरी छाती व सीने पर हाथ फेरते और बोलते- यार ऐसी बॉडी मैं नहीं बना पाया.

मेरी पीठ पर हाथ फेरते फेरते उनका हाथ नीचे मेरे चूतड़ों तक चला जाता था. वे मसक देते तो कभी गालों पर हाथ फेर देते थे.

एक बार मैंने हल्की मूंछें रख लीं तो बोले- आप क्लीन शेव स्मार्ट लगते हो.

हम दोनों एक दिन जब डिनर ले रहे थे तो शेखर जी बोले- यह भूरा आपका बड़ा अहसानमंद है. मेरे से कह रहा था कि उस दिन आप आवाज देकर होशियार नहीं करते तो इसकी ठुकाई हो जाती. प्रेमा का आदमी कल्लू इसकी गांड़ फाड़ देता.

मैं- कल्लू कौन? कब?
शेखर- अरे प्रेमा, वही औरत जिसकी भूरा उस दिन चुदाई कर रहा था रसोई में! तुम आवाज न देते तो दोनों पकड़े जाते. बहुत लफड़ा होता।

उनकी ओर देखकर मैं मुस्कराया।
शेखर- तुमने तो बताया नहीं मगर भूरा ने बताया. वह तुम्हारा बहुत अहसान मंद है.
मैं हंसने लगा- कोई बात नहीं!

शेखर- वह तुम्हारा अहसान कैसे उतारे? तुम्हें दिलवाएं प्रेमा की?
मैं- अरे नहीं शेखर जी, उससे बढ़िया तो भूरा ही है.
शेखर- अच्छा, गांव की पसंद नहीं आती क्या तुम्हें?
मैं- नहीं, मैं इस रंग में नहीं.

फिर वो बोले- तुमने कहा कि भूरा अच्छा है, इसका क्या मतलब हुआ?
मैं- अरे आप तो दूसरी ओर ले गये, मेरा मतलब था कि प्रेमा के साथ तो भूरा ही जमता है.

शेखर- तो अब तुम्हारे लिये भूरा को तैयार करें?
मैं- वो अब तैयार नहीं होगा. आप बात करके देख लो.
मैं भूरा की ओर देखकर मुस्कराया तो भूरा के भी दांत निकल आये.

फिर भूरा उस दिन मुझे छोड़ने मेरे निवास तक आया.
रास्ते में मैंने पूछा- शेखर को क्यों बताया वो सब?
वह मुस्कराने लगा.

मैंने कहा- तो पहले भी चुदाई करते रहे हो?
वह बोला- साहब पहले धमका देते थे, अब नहीं।
मैंने पूछा- अब क्यों नहीं?

उसने मेरे इस प्रश्न का कोई उत्तर न दिया. बस मेरे बदन से सट कर सीधा चलता रहा.

एक दिन डॉक बंगले पर मोटर साईकिल पर एक नौजवान आया.
वह शेखर से बात करता रहा.
फिर उन्होंने भूरा से कहकर गांव से अंडे मंगाए और एग करी बनवाई.

हम सब ने मिल कर खाना खाया. फिर वह लड़का अपनी बाईक की डिक्की से दारू की बोतल ले आया. वे दोनों मिल कर पीते रहे।

फिर एक कमरे में फर्श पर गद्दा बिछाकर हम तीनों लेट गये.

नींद सी आने लगी थी मगर अचानक रात को वह लड़का उल्टी करने लगा. उसने दो तीन बार उल्टी की. हमने फिर उसका मुंह धुलवाया. उसके कपड़े खराब हो गये थे.

भूरा ने उसके सारे कपड़े उतार दिये और धोने के लिए ले गया.
फिर हमने एक तौलिया गीली की और उसके शरीर को पौंछा. उसके लंड और चूतड़ों को भी साफ किया.

उसके चूतड़ बहुत मस्त थे.

जब मैं चूतड़ पौंछ रहा था तो शेखर जी भी मेरी ओर देख रहे थे.
वो बोले- कैसे हैं?
मैंने कहा- बहुत मस्त हैं.
शेखर- तो चढ़ बैठो फिर!

मैं मुस्कराने लगा.
वो बोले- सोच क्या रहे हो, कुछ नहीं बोलेगा ये. अभी बेहोश है और गांड भी ढीली पड़ी है.
मैं बोला- नहीं, अभी नहीं, सुबह इसको पटाकर करूंगा.

शेखर- अरे आप अभी तो कर लो, वो सुबह फिर दोबारा से भी तैयार हो जायेगा.
वो लड़का मेरे सामने नंगा लेटा था.
मगर मैं शेखर के सामने थोड़ा हिचकिचा रहा था इसलिए मन मारकर रह गया.

मैंने मना कर दिया.

रात को मैंने देखा कि शेखर जी उस पर चढ़े हुए थे. अपना 9 इंची लंड उसकी गांड पर टिकाये हुए थे. वो अपने लंड पर थूक लगा रहे थे. मैं उनके बगल में ही लेटा हुआ था लेकिन उनका ध्यान लौंडे की गांड और अपने लंड पर ही था.

पूरी तरह से लौड़ा तैयार करने के बाद उन्होंने उस लड़के की गांड में लंड को धीरे धीरे घुसाना शुरू किया.
वो लड़का हल्के हल्के कुनमुनाने लगा.
मगर शेखर जी का लंड गांड का भेदन करता हुआ अंदर घुसा ही चला जा रहा था.

देखते ही देखते शेखर ने अपना पूरा लंड उसकी गांड में उतार दिया.

लड़के के मुंह से आवाज होते देख उन्होंने उसके मुंह पर हाथ रख दिया.
फिर उसके कान के पास होकर फुसफुसाये- अबे चुप कर, पास में सो रहा ये लौड़ा भी जाग जायेगा.

अब वो धीरे धीरे उसकी गांड में लंड को चलाने लगे. मुझे शेखर का लंड लड़के की गांड में अंदर बाहर होता हुआ दिखाई दे रहा था.

वो लड़का अपने चूतड़ सिकोड़ता हुआ दिख रहा था और शेखर जी उसके चूतड़ों को थपथपाते हुए कह रहे थे- ढीले कर यार, गांड मत सिकोड़.

शेखर जी अब धक्के देने लगे थे अंदर-बाहर अंदर-बाहर।
वे बड़ी सावधानी से चुदाई कर रहे थे.
उनकी चुदाई का स्टाइल देख कर लग रहा था कि वे पुराने लौंडेबाज हैं. उनका लंड कइयों की गांड का मजा ले चुका है.

इधर मेरी गांड भी लंड देखकर मचल चुकी थी. मगर क्या करता, चुपचाप लेटा रहा और गांड चुदाई देखता रहा. फिर शेखर जी झड़ गये और उन्होंने लंड को बाहर निकाल लिया.

फिर वो लंड को धोकर आये और सो गये.

सुबह जब उठा तो लड़का नंगा ही था.
मैं समझ गया कि कपड़े नहीं है उसके पास.

फिर वो नहाया और बाहर आया.
उस वक्त उसने केवल तौलिया लपेटा हुआ था.

वो कहने लगा- सर जी, रात को आपने बहुत ज्यादा पिला दी. खुद कम पी और रात भर मेरी रगड़ते रहे. मैं आपकी सब चालाकी समझता हूं. अभी तक दुख रही है.
बड़ी ही बेशर्मी से वो ये सब कहता हुआ दांत निकाल रहा था.

उसके बाद फिर एक दिन की बात है कि मैं शाम को अचानक बंगले पर आ गया.
अंदर गया तो देखा कि भूरा किचन की स्लैब से चिपका हुआ खड़ा हुआ था. उसका बरमूडा नीचे खिसका हुआ था.

भूरा के गोरे गोरे चूतड़ देखकर मैं तो दंग रह गया. ऐसी सुडौल गांड किसी मर्द की पहले नहीं देखी थी कभी. एकदम से गोल गोल और बहुत मस्त.

देखते हुए ही मेरा तो खड़ा हो गया.

उसके पीछे शेखर जी खड़े थे और उनका औजार उनके एक हाथ में था.
वो उसको भूरा की गांड में डालने की तैयारी कर रहे थे.
उनका हथियार देखकर मेरी गांड भी कुलबुलाने लगी थी.

दूसरे हाथ से वे लंड पर मुंह से थूक निकाल कर लगा रहे थे.

एक बार फिर लंड की खाल खींच कर आगे पीछे की. उनका लाल सुपारा चमक रहा था.
अब उन्होंने उसकी गांड पर थूक लगाया और अपना मस्त लंड गांड पर टिका दिया.

अगले ही पल लंड को गांड में पेल दिया और ये देखकर मेरी सिसकारी छूट गई.
अब वे झटके देने लगे.

शेखर जी ने मुझे देख लिया.
मैं आकर दूसरे कमरे में बैठ गया।
दूसरे कमरे में उनकी हूं … हूं की आवाज यहां तक आ रही थी.

भूरा के मुंह से बार बार यही निकल रहा था- सर जी … थोड़ा धीरे … आह्ह … धीरे करिये न … आह्ह।
ऐसी कामुक आवाजें सुनकर मैं बेकाबू सा हो रहा था.

मैं वहीं पर अपनी मुट्ठ मारने लगा और चुदाई की पट पट की आवाज से ही उत्तेजित होकर झड़ गया.

फिर चुपके से वहां से वापस आ गया.

एक दिन मैं डाक बंगले में रात के समय पहुंचा.
मैं उस दिन जिला मुख्यालय से बस से आया था. जहां बस ने उतारा वह जगह डाक बंगले के पास थी, अतः टेकरी चढ़ कर डाक बंगले पहुंच गया.

उस दिन वहां बहुत भीड़ थी. कोई साहब ठहरे थे.
रात के नौ बज रहे थे.

शेखर जी मुझे सीधे अपने कमरे में ले गए. मेरे लिये वहीं खाने की थाली ला दी.
बहुत भूखा था तो मैंने जमकर भोजन किया.

उसके बाद मैंने कपड़े उतारे और केवल अंडर वियर पहने मैं बिस्तर पर जाने लगा तो शेखर जी मेरे चूतड़ों पर हाथ मार कर बोले- आप तो उन दोनों लौंडों सुनील और भूरा को भी मात करते हो. क्या बॉडी है … आज अंडर वियर बनियान में पहली बार देखा आपको.

मैं बहुत थका हुआ था इसलिए मैंने शेखर जी को औपचारिक मुस्कान दी और वो फिर आये हुए गेस्ट की खातिरदारी में फिर से व्यस्त हो गये.

रात को मेरी आंख खुली तो देखा कि शेखर जी मेरी बगल में ही सो रहे थे.

वो मेरे से चिपक कर लेटे हुए थे. उनकी एक टांग आधा घुटना मोड़ कर मेरे ऊपर पसरी थी.
उनका फनफनाता लंड मेरी जांघ से टकरा रहा था।

मैं चित लेटा था.
फिर वे और ज्यादा चिपक गए. अब उनका हथियार मेरे पेट के निचले हिस्से से टकरा रहा था।

मैंने करवट बदली तो उनके मुंह से आती दारू की बदबू ने मुझे मजबूर कर दिया।
मैं फिर से दूसरी ओर पलटा. अब मेरी पीठ उनकी तरफ थी.

उनका खड़़ा मस्त लंड मेरे चूतड़ों से टकरा रहा था. उन्होंने शायद उसे अपने अंडरवियर की कैद से आजाद कर दिया था. अब वह मेरे चूतड़ों से टकरा रहा था.

उन्होंने अपनी जांघ मेरे ऊपर कस ली. उनका लंड मेरे दोनों चूतड़ों के बीच बार बार टक्कर पर टक्कर दे रहा था. अपना हाथ अब उन्होंने मेरे सीने पर कस लिया.

वे मेरी गर्दन के पीछे अपने होंठ रगड़ रहे थे। मुझे दारू की बदबू से मतली आ रही थी.

मेरी गांड बुरी तरह कुलबुला रही थी. मैं सोच रहा था कि बस अब वे मेरा अंडरवियर नीचे करके अपना लंड मेरे छेद में पेल दें.
मगर वो ऊपर से ही टक्कर देने में लगे हुए थे.

ऐेसे ही रगड़ते हुए उनका वीर्य छूट गया और उन्होंने मेरे अंडरवियर को गांड के छेद के पास वाले हिस्से पर पूरा गीला कर दिया.

मेरी गांड प्यासी रह गयी. फिर वो मेरे से चिपक कर सो गये.
उस रात भी मैं तड़प कर रह गया.

फिर एक दिन मैं अपने निवास के क्वार्टर से डाकबंगले की ओर आ रहा था तो देखा कि रास्ते में भूरा से एक लड़का उसी का समवयस्क झगड़ रहा था.

उसने उसका कॉलर पकड़ा हुआ था. वह हाथ उठा कर उसे मारने ही वाला था कि मैंने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया. उन्हें अलग किया, फिर पूछा- क्या बात है?

लड़का वहां से फिर देखने की धमकी देकर चला गया.
बदले में भूरा ने भी कह दिया कि जब मन करे निपट लेना.

फिर वो मेरे साथ आने लगा तो मैंने पूछा- क्या बात हो गयी थी?
वह बोला- यह एक लड़की को जबरदस्ती चोदना चाहता था. मैंने लड़की की मदद की तो ये चिढ़ गया.

मैंने पूछा- तो लड़की तुम्हारी दोस्त थी?
इस पर भूरा मुस्करा दिया.
मैंने पूछा- कितनी बार चोद चुके हो उसे?

भूरा- अरे सर, एक दिन शाम को वह बकरियां बाड़े में बंद करने जा रही थी. उसने मेरी मदद मांगी तो मैंने उसको बाड़े में ही चोद दिया.
मैं- तो क्या वह तैयार थी?

वो बोला- पहले तो मना कर रही थी लंड डालने के लिए. फिर मैंने उसकी साड़ी ऊपर कर दी और उसके चूतड़ों में लंड लगा कर उसकी चूची भींचने लगा. उसको मजा आया तो फिर दोबारा कहने पर तैयार हो गयी. मैंने उसको वहीं खड़ी खड़ी चोद दिया.
अब सम्मू भी उसको चोदना चाह रहा था लेकिन वो नहीं मान रही थी. मैंने उसकी मदद की तो सम्मू मेरे से चिढ़ गया. मगर आपने सही किया कि आप आ गये. उसका हाथ मरोड़ दिया. अब वो चुप रहेगा.

ये सब बातें करते हुए हम लोग डाक बंगले तक पहुंच गये.

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कहानी का अगला भाग: डाक बंगले में गांड चुदाई- 2

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