ख्वाहिश पूरी की

दोस्तो, मैं अर्पित सिंह एक बार फिर से अपनी अधूरी प्रेम कहानी की आगे की दास्ताँ ले कर हाज़िर हुआ हूँ।

मेरी पिछली कहानियों
एक दूसरे में समाये-1
एक दूसरे में समाये-2
एक दूसरे में समाये-3 एवं
बेइन्तिहा मुहब्बत
को आप सब का इतना प्यार मिला उसका मैं बहुत आभारी हूँ लेकिन आपका गुनहगार भी हूँ क्योंकि आपको आगे की दास्ताँ के लिए बहुत ज्यादा इंतज़ार करवाया। मुझे इस गलती के लिए माफ़ करना…
उम्मीद करता हूँ कि अपनी कहानी की मदद से अपने इस गुनाह को कम कर सकूँ।
पुनर्कथन के लिए कृपया प्रकाशित कहानियों का सन्दर्भ ग्रहण करें।
दोस्तो, प्यार.. इश्क.. मोहब्बत… इन शब्दों का मतलब सिर्फ वही समझ सकते हैं जिन्होंने इसे महसूस किया है, वरना ये सारे शब्द बेमानी से लगते हैं।
मैं ईशानी को बेहद चाहने लगा था और मुझे इस बात का भी यकीन था कि वो भी मुझे उतना ही चाहती है।
मैंने ईशानी से वादा किया था कि मैं उसको कहीं ऐसी जगह ले जाऊँगा जहाँ हम दोनों के सिवा कोई नहीं होगा..
और मेरा दिमाग सिर्फ यही योजना बनाने में लगा हुआ था कि मैं उसकी यह ख्वाहिश पूरी करूँ…
चाहे उसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़े।
यह सब करते करते मेरी छुट्टियाँ ख़त्म हो गई और मेरे कॉलेज वापस जाने का वक़्त आ गया।
ईशानी से दूर होने का सोच कर भी रूह काँप उठती थी और वक़्त कह रहा था कि अब और पास नहीं रह सकते।
मुझे अगले दिन सुबह जाना था और मेरी जाने की सारी तैयारियाँ भी हो चुकी थी।
आज सुबह जब ‘चाय; सुनकर मेरी नींद खुली तो रोज़ की तरह मुझे लगा कि ईशानी ही होगी लेकिन जब आँखें खोलीं तो देखा कि रामू काका चाय साइड टेबल पर रख रहे थे और मुझे उठा हुआ देख कर उन्होंने कहा- अर्पित बाबा उठ जाओ, आपकी चाय आ गई है। सुबह की चाय हमेशा ईशानी ही लेकर आया करती थी आज उसको न देखकर ऐसा लगा जैसे मेरी सुबह हुई ही नहीं लेकिन इसी के साथ इस बात का भी यकीन होने लगा कि अब इस खूबसूरत सपने का आखिरी पड़ाव चल रहा है जिसमें सिर्फ आज का ही एक दिन बचा हुआ है।
मैं तैयार होकर नीचे गया और डायनिंग टेबल पर बैठ गया, नाश्ता टेबल पर लग चुका था लेकिन ईशानी कही नज़र नहीं आ रही थी। मेरी नज़र सिर्फ अपने प्यार के दीदार को तरस रही थी और एक वो थी कि पता नहीं कहा गायब हो गई थी।
खैर मैंने भी अनमने ढंग से नाश्ता किया और अपने कमरे में आ गया।
ईशानी मेरे कमरे में मेरा सामान जो माँ ने मुझे ले जाने के लिये अपने हाथों से बनाया था, रख रही थी।
मेरे जाने का समय हो रहा था, मैंने ईशानी को अपनी बाहों में भर लिया और उसके माथे को चूम लिया।
तभी माँ के आने की आहट सुन कर हम दोनों एक दूसरे से अलग हो गये।
पिता जी मुझे ले जाने के लिये मेरा इन्तज़ार कर रहे थे।
मैंने अपना सामान उठया और नीचे जाने लगा।
माँ और ईशानी मेरे पीछे थी।
ईशानी से अलग होने का एहसास मुझे पागल किये जा रहा था।
मेरा मन बस यही कह रहा था कि ईशानी को अपनी बाहों में भर लूँ और उसे अपने साथ ले चलूँ, एक पल भी मुझे उससे दूर न रहना पड़े।
ऐसा लग रहा था जैसे मेरे शरीर का कोई हिस्सा मुझसे अलग किया जा रहा है, उस दर्द को बर्दाश्त करने की न तो क्षमता थी मेरे अंदर और न ही हैसियत।
दिल फूट फूट के रो रहा था और दिमाग दर्द से फटा जा रहा था।
बस एक ख्वाहिश कि ईशानी को जाने से पहले गले लगा के खूब रो लूँ।
ईशानी के दिमाग में क्या था, यह तो नहीं पता लेकिन उसकी ख़ामोशी और उसका मुरझाया हुआ चेहरा उसके दर्द को बयाँ करने के लिए काफी था।
गाड़ी में सामान रखा जा चुका था, मैंने माँ के पैर छुए !
अचानक ईशानी ने मेरे तरफ हाथ मिलाने के लिए बढ़ाया, मैंने बिना कुछ सोचे समझे उसके हाथों से ही उसको अपनी तरफ खींच कर अपने गले से लगा लिया।
अपनी पूरी ताकत से मैंने उसको भींच रखा था लेकिन इस बात का भी ख्याल था कि आलिंगन की प्रगाढ़ता से हम दोनों के बीच की अंतरंगता का एहसास माँ और पिता जी को न हो।
ना चाहते हुए भी मुझे ईशानी से अलग होना पड़ा और मैं चुपचाप गाड़ी में बैठ गया।
कब घर से मैं हॉस्टल पहुँच गया, मुझे इस बात का पता ही नहीं चला, सिर्फ इस बात का एहसास था कि मैं ईशानी से दूर बहुत दूर आ चुका हूँ।
वो समय ऐसा था जब मोबाइल फ़ोन इतने सुलभ नहीं थे जिसकी वजह से मैं ईशानी से बात भी नहीं कर पाता था।
जब कभी घर की लैंड लाइन वो उठा लेती थी तो उसकी आवाज़ सुन कर जान में जान आ जाती थी और मैं उससे पूछ बैठता था- कैसी हो तुम?
और वो हमेशा यही जवाब देती थी- कैसी हो सकती हूँ तुम्हारे बिना?
हम ज्यादा बात कर भी नहीं पाते थे।
एक बार फ़ोन पर उसने मुझे बताया कि उसके कॉलेज का ट्रिप जा रहा है मनाली और एक हफ्ते का ट्रेकिंग कैंप है।
मैंने कहा- इस ट्रिप पर मैं भी आना चाहता हूँ तुम्हारे साथ !
तो उसने कहा- यह पॉसिबल नहीं होगा, कॉलेज के सारे लोग होंगे वहाँ।
मैंने कहा- मुझे नहीं पता, मुझे बस तुमसे मिलना है, तुम्हें देखना है, तुम्हें बाहों में भरना है, तुम्हें ढेर सारा प्यार करना है और अभी जबकि मैं तुमसे कुछ हज़ार किलोमीटर दूर हूँ, मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूँ।
फिर हमने प्लान बनाया कि घर से तुम अपने कैंप के लिए निकलना और कॉलेज में बोलना कि तुम नहीं जा रही हो मैं दिल्ली आकर तुम्हें साथ लेकर कहीं और चलूँगा।
नियत समय पर मैं दिल्ली पहुँच गया।
एअरपोर्ट पर ईशानी मेरा इंतज़ार कर रही थी।
उसे देखते ही मेरी आँखों से आँसू निकल गए और मैंने दौड़ कर उसे अपने गले से लगा लिया।
हम दोनों एक दूसरे से लिपटे हुए काफी देर तक रो रो कर अपने बिछड़ने के एहसास को धोने में लगे थे।
मैंने अपने एक मित्र से कहकर गाड़ी का इंतज़ाम कर रखा था। हम दोनों गाड़ी में बैठ कर सोच रहे थे कि चलें कहाँ?

हमारे पास पूरे एक हफ्ते का समय था एक दूसरे के साथ वक़्त बिताने का।
हम लोग अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहते थे इसलिए हमने सोचा क्यों न हम यही दिल्ली में ही कहीं होटल लेकर रुक जाएँ लेकिन कभी भी किसी के देखने का डर था इसलिए हमने तय किया कि हम लोग आगरा चलते हैं, वो जगह जहा मोहब्बत की सबसे बड़ी इबारत एक इमारत के रूप में है।
दो प्यार करने वालों के लिए इससे अच्छी जगह क्या हो सकती है।
सबसे पहले हमने कुछ शॉपिंग की जिसमे मुख्यतः सिंदूर बिंदी चूड़ा और एक मंगलसूत्र था ताकि होटल में रुकने पर किसी को आपत्ति न हो और हम चल दिए आगरा मोहब्बत की एक नई इबारत लिखने।
आगरा पहुँच कर हमने एक बढ़िया होटल लिया और हमने अपने आपको पति पत्नी बताया, रिश्ता भी तो हमारा वही था, बस हमने सामाजिक रीति रिवाज़ से यह रिश्ता अपनाया नहीं था।
थोड़ी ही देर में हम अपने रूम में थे जो तीसरी मंज़िल पर था। रूम में पहुँचते ही हमारे सब्र का बांध टूट गया और हम एक दूसरे से लिपट गये।
हम दोनों एक दूसरे को बेतहाशा चूमे जा रहे थे और एक दूसरे के बदन को अपने बदन में समा लेना चाह रहे थे।
उत्तेज़ना में हमारे कपड़े कब उतर गए हमे पता ही नहीं चला।
मैं बिस्तर पर बैठा हुआ था और ईशानी खड़ी थी और मुझसे सटी हुई थी। दोस्तों उस समय बस यूँ लग रहा था कि अगर जन्नत कहीं है तो सिर्फ ईशानी की बाँहों में, ईशानी को प्यार करने में।
मेरा लिंग अपने पूरे उफान पर था और ईशानी की योनि से भी काम रस टपक रहा था।
हमें करना तो सम्भोग ही था लेकिन सम्भोग से पहले के इस जोश और आत्मीयता को हम आत्मसात कर लेना चाह रहे थे।
हम तब तक इस अवस्था का आनन्द उठाना चाहते थे जब तक कि हमारा लिंग और योनि स्वयं एक दूसरे से मिलकर हमें उत्तेजना के दूसरे चरण में न ले जाए।
मेरे बैठे होने की वजह से ईशानी के स्तन मेरे चेहरे पर थे और मैं उनको चूम चूम कर लाल कर चुका था।
मेरे दोनों हाथ उसके नितम्बों को दबा दबा कर और उसके गुदा द्वार को सहला कर उसकी उत्तेजना बढ़ाने में लगे हुए थे।
ईशानी कभी मेरे चेहरे को अपने हाथों में लेकर चूमती तो कभी मेरे चेहरे को अपने वक्षस्थल में छुपा लेती।
कभी उसके हाथ मेरे उत्तेजित लिंग की सहनशीलता का परिक्षण करते और कभी मेरे हाथों की गति को विराम देते जो उसकी योनि को कुरेदने का काम कर रहे थे।
मैं और ईशानी पूरी तरह से उत्तेजना में डूबे हुए थे, तभी उसकी आवाज आई- जान… अब और मत तरसाओ अपनी ईशानी को… अब मैं तुम्हारे लिंग को अपनी योनि में महसूस करना चाहती हूँ… अब और बर्दाश्त नहीं होता जान… डाल दो अपना लिंग मेरी योनि में और मुझे तोड़ दो अपनी बाहों में कस कर…
मैं ईशानी का यह प्रणय-निवेदन ठुकरा न सका और जैसे मैं बैठा था बेड के किनारे पर वैसे ही पैर लटकाये हुए लेट गया और ईशानी को अपने ऊपर आने का इशारा किया।
ईशानी अपने दोनों पैरों को मेरे सीने के अगल बगल कर के मेरे उफनते हुए लिंग पर अपनी योनि का दबाव डालते हुए बैठ गई। उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़…
एक बार में ही मेरा पूर्णतया उत्तेजित लिंग ईशानी की योनि में प्रवेश कर गया। ईशानी के मुख से एक उत्तेजक सिसकी निकल गई और उसने अपना पूरा दबाव मेरे लिंग पर डालते हुए मेरे पूरे लिंग को एक ही बार में योनि के अंदर लील लिया।
ऐसा लग रहा था जैसे मक्खन में गर्म चाकू का प्रवेश हो गया हो। योनि की वो गर्माहट और वो गीलापन… ऐसा लगा कि मेरा लिंग मोम का है और ईशानी की योनि-भट्टी में जाते ही पिंघल गया हो और टपक टपक कर उसकी योनि से कामरस के रूप में बाहर आ रहा है।
ईशानी की योनि में प्रवेश करते ही मेरे लिंग में और कठोरता आ गई।
ईशानी के मेरे ऊपर बैठने की वजह से लिंग उसकी योनि की अंदरुनी दीवारों पर शिश्नमुंड से दबाव बनाये हुए था और ईशानी के हिलने के फलस्वरूप लिंग पर घर्षण मुझे अत्यधिक उत्तेजित कर रहा था।
उधर ईशानी भी मेरे सम्पूर्ण उत्तेजित लिंग को अपनी योनि से भींच कर उसकी आकृति और परिमाण का अवलोकन करने में लगी थी। चूँकि ईशानी मेरे ऊपर थी इसलिए इस सम्भोग का पूरा नियंत्रण भी उसी के हाथ में था।
मेरे लिंग पर उसका उठना और बैठना मुझे पागल कर रहा था।
उसके उठने बैठने की लयबद्ध गति उसके साथ साथ मुझे भी धीरे धीरे चरमोत्कर्ष की ओर ले जा रही थी।
ईशानी इस अवस्था को पूरी तरह से उपयोग कर रही थी, वह अपनी संवेदना और उत्तेजना के हिसाब से लिंग को कभी पूरी तरह से योनि के अंदर डाल लेती थी और कभी आधे घुसे हुए लिंग पर गोल गोल घूम कर मेरी यौन शक्ति की परीक्षा लेती।
धीरे धीरे हमारी उत्तेजना भी अपने एक एक चरण पार करती हुई हमें शिखर की ओर ले जाती प्रतीत हुई।
उत्तेजना में मैंने ईशानी के दोनों पैरों के घुटने के नीचे से अपने दोनों हाथ निकाल कर उसकी नग्न पीठ पर उंगलियों की मदद से फंसा लिया।
अब उसके पैरों के पंजे मेरे दोनों कंधों पर थे। मैं अचानक उठ कर बैठ गया जिसकी वजह से मेरे लिंग का दबाव योनि में बढ़ गया। ईशानी उत्तेजक आवाजें निकलते हुए मुझसे और चिपक गई।
अब मैंने उसी अवस्था में ईशानी को उठा कर पीठ के बल बेड पर लिटा दिया और अपनी पूरी गति से अपना लिंग उसकी योनि में अंदर बाहर करने लगा।
अब मेरा धैर्य मेरे बस में नहीं था, मैं उत्तेजना के उस बिंदु पर था जहा सिर्फ चरमोत्कर्ष का ही ध्यान होता है।
मेरे घर्षण के साथ साथ ईशानी भी अपनी कमर हिल कर अपनी परम उत्तेजना का परिचय दे रही थी।
मेरे प्रत्येक घर्षण के साथ ईशानी के मुख से विभिन्न आवाजें निकल रही थीं जो मुझे और भी उत्तेजित कर रही थी।
आअह्ह अर्पित… ऊउफ़्फ़… फ़्फ़… और तेज़ करो जान… आआह्ह्ह्ह… जाआअन्न्न… बहोत मजा आ रा है बेबी… फ़क मी जान… और तेज आआअह्ह्ह्ह्ह…
मेरे प्रत्येक धक्के के साथ उसके मुख से हहउम्म्मम्प्प्प्प… ह्हूऊम्म्म्म्प्प्प्प… की आवाज से मैं मदहोश हो रहा था।
होटल का वो कमरा हमारी उत्तेजक आवाजों से गुलज़ार हो रहा था।
तभी ईशानी ने मुझे भींच लिया और कहा- जान, प्लीज डोंट स्टॉप ! और तेज करो जान… करते रहो… और तेज… आआह्हह्हह्ह… जान आआअह्हह… येस्सस्स… ऊऊओह्ह्ह्ह्ह॥ ह्ह्हूऊम्म्म्मप्प्प्प… आऔऊऊउह्ह्ह… जान… आई एम कमिंग बेबी… आआअह्ह्ह्ह्ह… हुउउउम्म्म्मप्प्पप्प… आआअह्ह्ह्ह… और इन उत्तेजक आवाजों के साथ ईशानी दोहरी होती चली गई और उत्तेजना के इसी प्रवाह में मैंने भी अपना सर्वस्व ईशानी की योनि में उड़ेल दिया और उसके ऊपर निढाल हो कर गिर गया।
हमारी सांसें बुरी तरह से फूल रही थीं… इतने कामुक स्खलन के बाद हम दोनों को कोई होश न रहा और मैं वैसे ही अपना लिंग ईशानी की योनि में डाले उसके ऊपर ही पड़ा रहा।
इस तरह से इस एक हफ्ते में हमने मोहब्बत के जाने कितने ही अध्याय मिल कर लिखे।
हम अपना एक एक पल एक दूसरे की बाहों में ही बिताते हर पल अपने इस प्यार को एक नया अंजाम दे रहे थे।
हम साथ रहते साथ खाते साथ नहाते और एक दूसरे को ढेर सारा प्यार करते।
हमारा ये प्रवास सिर्फ एक दूसरे को बिना रोक टोक प्यार करने के लिए ही तो था और हमने सात दिनों में एक दूसरे को सिर्फ प्यार किया।
और फिर वो दिन भी आ गया जब हमें अलग होना था लेकिन इस बार बिछड़ने के दुःख से ज्यादा एक दूसरे को इतना प्यार देने की ख़ुशी थी।
लेकिन फिर भी इस हसीं सपने जैसे साथ का खत्म हो जाना हमें कचोट रहा था।
हमने एक दूसरे से वादा किया कि जब भी हमें मौका मिलेगा हम दुबारा ऐसा प्रोग्राम जरूर बनाएँगे।
दोस्तो, मेरी और ईशानी की कहानी कोई सेक्स कथा नहीं, बल्कि दो दिलों के प्यार की कहानी है।
आगे और भी बहुत कुछ है हमारे प्यार के बारे में जो आपको बताना है लेकिन सिर्फ आपकी प्रतिक्रिया प्राप्त होने के बाद !
आप सबके मेल और संदेशों का मुझे इंतज़ार रहेगा…
आपका अपना अर्पित सिंह
[email protected]

What did you think of this story??

Comments

Scroll To Top