दिल अटका अटका सा-2

लेखिका : कामिनी सक्सेना

नेहा के हाथों की गति तेज होती जा रही थी… और फिर स्पर्श ने एक तेज चीख सी निकाली और उसके लण्ड ने जोर से पिचकारी छोड़ दी।

नेहा तो जानती ही थी यह सब… उसने लपक कर नल से अपना मुख लगा लिया और उसका पानी पीने लगी।

“निकालो… और निकालो… आह्ह्ह्ह !”

और नेहा उसे पीती गई। वो अपना रस पिचकारियों के रूप में छोड़ता रहा।

“मजा आया ना स्पर्श…?”

“उफ़्फ़्फ़, मेरी तो तुमने जान ही निकाल दी थी।”

“और मेरी जान तुमने जो निकाल दी उसका क्या…?”

दोनों हंसने लगे। फिर अचानक स्पर्श चौंक गया- अरे शाम हो रही है… मेरा स्टाफ़ मेरी राह देख रहा होगा।

“अरे तो क्या हो गया… सुनील तो सात बजे तक काम करता रहता है।”

“हमारा काम सूरज ढलने के बाद अंधेरे में नहीं होता है…”

जीप से पानी की बोतल लेकर हमने अपने अंग धो कर साफ़ कर लिये। फिर ठीक से सज-संवर कर वापस कार्य स्थल पर लौट गये।

सामान बांध कर हम लौट गये। हमारे लौटने तक सुनील नहीं लौटा था।

कैम्प में चाय नाश्ता बन कर आ गया था। नेहा स्पर्श को बहुत प्यार से देख रही थी। स्पर्श भी नेहा का दीवाना हो चुका था।

रात भर स्पर्श नेहा के बारे में सोचता रहा। उसकी कोमल चूत, उसके भारी स्तन, कूल्हे सभी कुछ उसे सोने नहीं दे रहे थे। दो बार रात को उसका वीर्य स्खलन चुका था। यही हाल नेहा का भी था। रात भर वो स्पर्श के बारे में सोच सोच कर तड़पती रही। चूत को घिस घिस कर वो भी कई बार झड़ चुकी थी। इसके विपरीत सुनील थका हारा गहरी नींद में खर्राटे भर रहा था।

दूसरे दिन भी सवेरे नेहा स्पर्श के साथ चिपक ली। सुनील अकेला ही अपने स्टाफ़ के साथ सर्वे पर चला गया।

उसके जाने के बाद स्पर्श ने कहा- आज गांव के सरपंच से मिलने जाना है इसलिये आज कोई भी सर्वे नहीं होगा।

उसने जीप ली और नेहा को साथ ले लिया।

“सुनो तो स्पर्श, सब क्या कहेंगे?”

“अरे उन्हें तो आज छुट्टी मिल गई है, सब खुश होंगे।”

“उन्हें शक नहीं होगा?”

“होने दो ना… और शक क्या… सही बात तो है।”

नेहा उसकी तरफ़ देख कर शरारत से मुस्कराई। स्पर्श ने भी एक शरारत भरी मुस्कान से उसे देखा।

पांच-छः किलोमीटर चलने के बाद उसने अपनी जीप एक झाड़ी के पास खड़ी कर दी और उतर कर उसने एक रेत के टीले की तरफ़ इशारा किया।

“आओ वहाँ चलें।”

नेहा और स्पर्श उस टीले की चोटी पर पहुंच गये, वहाँ से रेत का सुन्दर नजारा देखा। नेहा ने साथ लाई चादर वहां पर बिछा दी और उसके एक कोने में सारा सामान रख दिया।

फिर वो बेफ़िकरी से चादर पर लेट गई। मस्त हवा के झोंके से उसका टॉप बार बार उड़ा जा रहा था। उसने शरारत से अपना टॉप उघाड़ कर ऊपर लिया और अपने नंगी पहाड़ जैसी चूचियाँ हवा में उछाल दी। स्पर्श ने भी उत्तेजित होकर अपनी शर्ट उतार दी। उसका बलिष्ठ शरीर छाती की मछलियां, उसके एब्स उभर आये।

स्पर्श ने झुक कर नेहा की टॉप हाथों के ऊपर से खींच ली। नेहा का मचलता शरीर किसी मछली की भांति तड़प रहा था। स्पर्श ने जोश में आ कर अपनी जीन्स उतार दी। उसने अन्दर कोई चड्डी नहीं पहनी थी। वो अब पूरा नंगा था। उसका तना हुआ लण्ड उसके शरीर पर काम देवता की तरह लहरा रहा था। नेहा ने भी अपनी जीन्स उतार डाली। दो जवान नंगे जिस्म रेगिस्तान में जल बिन मछली की तरह काम वासना में तड़प रहे थे।

“स्पर्श, अब कितना तड़पाओगे… पता है तुम्हारी याद में रात भर कितनी तड़पी।”

“ओह्ह जानी… मेरी रानी… रात को दो बार मेरा भी जवानी का रस अपने आप ही तुम्हें याद करता हुआ निकल गया था।”

“तो आओ ना… अपना अपना रस एक दूसरे पर कुर्बान कर दें।”

“हाँ मेरी जानू…”

स्पर्श ने जल्दी से कण्डोम निकाला और लण्ड पर पहनने लगा। नेहा ने उसे अपने पास बुलाया और कण्डम को दूर फ़ेंकते हुये कहा- यह क्या कर रहे हो… क्या लण्ड को ऐसे तड़पाओगे, और मेरी चूत को रबड़ से घिसोगे, मैं कोई रण्डी तो नहीं हू ना… गीले नंगे लण्ड को मेरी चूत में घुसने दो।

स्पर्श नेहा के पास आ कर बैठ गया।

“अब बारी बारी से नम्बर लगाओ… पहले मेरी गाण्ड चोदो… फिर चूत को चोदना…” यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉंम पर पढ़ रहे हैं।

“हाय रानी… इस मटका गाण्ड चोदने का मन तो मेरा कब से ललचा रहा था। इस लण्ड को देखो तुम्हारी गाण्ड को देख कर लण्ड का बुरा हाल हो जाता था, आओ इसकी तड़प मिटा दो।”

नेहा उछल कर घोड़ी सी बन गई और अपनी गाण्ड उसने उभार दी।

“अरे गाण्ड में तेल डाल कर आई हो क्या…?”

“आज मुझे चुदवाना तो था ही सो पूरी तैयारी से आई हूँ।”

अपने तने हुये लण्ड पर स्पर्श ने थूक लगाया और उसे नेहा की खिली हुई गाण्ड के छेद पर रख दिया।

“चलो… चलो… जोर लगाओ… देखना मस्ती से चोदेगा मेरी गाण्ड को, तुम्हारा ये कड़क लण्ड…”

सच में स्पर्श का सख्त लण्ड बिना किसी तकलीफ़ से नेहा की गाण्ड में घुस गया।

“उह्ह्ह… जालिम… कितना चिकना है… अब चल अन्दर चल…”

स्पर्श को लण्ड घुसते ही एक अनोखा अनुभव हुआ… इतना सुन्दर अहसास… उसने धीरे धीरे करके अन्दर बाहर करते हुये अपना पूरा लण्ड भीतर तक ठोक दिया। नेहा मारे आनन्द के मस्ता उठी। स्पर्श ने जैसे ही लण्ड अन्दर बाहर करके उसकी गाण्ड चोदनी शुरू की, वो आनन्द से बेहाल हो गया। स्पर्श ने नेहा को आनन्द देने के लिये अपना हाथ नीचे घुसा कर उसकी चूत सहलाना शुरू कर दी। वो आनन्द के मारे चीख उठी। वो कभी उसके मम्मे भींचता कभी उसके चुचूक मल देता था। कभी उसके दाने को सहला देता था तो कभी चूत में अंगुली घुसा देता था।

कसी हुई गाण्ड में उसका लण्ड बहुत तेजी से अन्दर-बाहर हो रहा था। तभी नेहा आनन्द से चीखती हुई झड़ने लगी। स्पर्श में भी इतना दम कहाँ था। कसी हुई गाण्ड ने उसके लण्ड को रग़ड़ कर रख दिया था। वो भी एक मधुर आह के साथ उसकी गाण्ड में ही झड़ने लगा था।

“हाय स्पर्श… बस… अब बस कर… मजा आ गया मेरे राम… उह्ह्ह्ह… क्या गाण्ड चोदी है।”

“नेहा जी, मेरा तो पूरा दम ही निकल गया। सारा का सारा माल निकाल डाला।”

स्पर्श पास ही रेत में अपनी टांगें फ़ैला कर लेट गया। लेटे लेटे ही उसकी आँख जाने कब लग गई। लगता था कि उसने इतनी मेहनत कभी नहीं की थी। नेहा उठी और मात्र तौलिया बांध कर नीचे जीप में आकर कुछ खाने का सामान और एक बोतल पानी ले आई। ठण्डी हवा ने स्पर्श को गहरी नींद में सुला दिया था। उसे इस तरह सोता देख कर वो तो नंगी ही उस पर अपना एक पैर डाल कर लिपट कर लेट गई।

तभी उसे लगा कि कोई उसके पास खड़ा है।

उसका दिल धक से रह गया, इस सुनसान रेगिस्तान में जाने कौन होगा। उसने डरते डरते पीछे मुड़ कर देखा तो स्पर्श का सहायक था। उसने धीरे से अपना हाथ जोड़ दिया।

नेहा ने उसे चुप रहने का इशारा किया तो वो अपनी कमीज उतारने लगा।

“अरे क्या कर रहे हो राजू…?”

वो पैंट उतारते हुये बोला- बस मेमसाहब, बहती गंगा में मुझे भी नहाने दो।

वो एक दुबला पतला लड़का जरूर था। पर गांव का होने से उसका लण्ड बहुत लम्बा और मोटा था। स्पर्श से भी अधिक मोटा था। नेहा कुछ कुछ कहती उसके पहले ही राजू उससे लिपट गया। उसका लण्ड काला और सुपाड़ा मोटा पर भूरा था।

“राजू प्लीज रुक तो जा… अभी नहीं, साहब उठ जायेंगे तो…!”

“साहब ने भी तो चुद्दा मारा था… अब मुझे चुद्दा मारने दो।”

“साहब ने चोदा नहीं था वो तो बस गाण्ड मारी थी।”

अब तक राजू ने नेहा को पूरी से तरह से बस में कर लिया था। उसके मुख से बीड़ी की बदबू आ रही थी। उसने नेहा की चूचियाँ दबाई और चूत में लण्ड डालने की कोशिश करने लगा।

“राजू बहुत मोटा है… रुक जा ना…!”

पर उसका लण्ड अन्दर सरक चुका था। नेहा को लगा कि उसकी चूत फ़ट जायेगी। बहुत ही मोटा था उसका लण्ड।

“राजू, देख फ़ट जायेगी, धीरे से कर ना…”

यह बात राजू के समझ में आ गई। उसने अपना शरीर ऊपर उठा कर नीचे देखते हुये लण्ड को धीरे धीरे घुसाने लगा।

“मेम साहब, मेरी लुगाई तो मेरा लण्ड गपागप यूँ लेती है कि मानो मूंगफ़ली हो।”

नेहा को एक बार तो हंसी आ गई, फिर बोली- अच्छा, ठीक है… आराम से चोद… देख मुझे तकलीफ़ नहीं देना।

वो धीरे धीरे नेहा को चोदने लगा। कुछ देर में उसके मोटे लण्ड को अपनी नेहा की चूत ने जगह दे दी। उसे उस मोटे लण्ड से चुदना बहुत आनन्ददायक लग रहा था। जब नेहा का मन शान्त हो गया तो उसने अपने कपड़े पहन लिये।

“ये तो अभी तक सो रहे हैं… क्या करूँ…?”

“अच्छा तो जाऊँ मेम साहब, कभी मेरी सेवा की जरूरत का मन हो तो मुझे बुला लेना।”

“ऐ सुनो तो राजू, ये बीड़ी मत पीना, मुझे उल्टी आती है, और हाँ नहा-धो कर साफ़ हो कर आना… ऐसे नहीं।”

“ये अभी आधे घण्टे और सोयेंगे… इन्होने सुबह सुबह ही नशे का पानी जानबूझ कर पी लिया था कि दम बना रहेगा। अब हम तो मजदूर हैं ना… दम तो बना रहता है पर नींद खूब आती है।”

फिर वो हंसता हुआ चला गया। नेहा सोचने लगी कि राजू सिर्फ़ उसे चोदने के लिये इतनी दूर पैदल आ गया। पर जल्दी ही उसे पता चल गया कि वो किसी की साईकल लेकर आया था।

नेहा राजू से चुद कर खूब प्रसन्न हो गई थी। अब उसे स्पर्श से और चुदने की इच्छा नहीं थी। दिन के ग्यारह बजने वाले थे। धूप तेज हो गई थी। नेहा ने स्पर्श को कपड़े पहनाये और उसके उठने का इन्तजार करने लगी। रेत बहुत गर्म हो गई थी वो एक झाड़ी के नीचे कब तक बैठती। उसे जबरदस्ती उठाया।

“अरे सोने के लिये आये थे क्या…?”

स्पर्श का शरीर टूट रहा था। उसने कुछ नहीं कहा। नेहा ने उसे खड़ा किया। उसे ठीक से कपड़े पहनाये। उसे घसीट कर जीप तक लाई और उसे एक तरफ़ बैठा दिया। अपनी याद के सहारे जीप को ड्राइव करते हुये कैम्प तक आ गई।

राजू पहले ही पहुँच चुका था। उसने स्पर्श को सहारा देकर उसके कमरे में पहुँचा दिया, वहाँ वो दो बजे तक और सोता रहा। जब वो उठा तो उसे ये समझ में नहीं आ रहा था कि वो यहाँ पहुंचा कैसे था? क्या हुआ था? पर कौन बताता उसे कि क्या हुआ था।

नेहा को तो राजू के रूप में एक चोदने वाला मिल गया था। वो तो उस के मोटे लम्बे लण्ड से बहुत सन्तुष्ट थी। पर उससे चुदने के लिये अब वो क्या बहाना करे… यह सोच कर नेहा का दिल बार बार अटका अटका सा लगने लगता था। क्या करे कैसा बहाना करे… कुछ समझ में नहीं आ रहा था… राजू तो बस एक सहायक ही तो था… उसे कहाँ ले जाये, कैसे बुलाये, रात को तो… उफ़्फ़ नहीं बाबा नहीं… जीप तो साहब के पास होती है… तो गाड़ी तो रुक ही गई ना…

कामिनी सक्सेना

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